विद्या की पूंजी
   Date09-Nov-2019

प्रेरणादीप
वि श्वविख्यात संगीतकार बिथोवन के प्रशिक्षक गुरु ने एक बार उनके एक मित्र को जो कि एक राजकुमार था, कहा-'यों तो विश्व में हजारों राजकुमार होंगे, किंतु उन राजकुमारों की भीड़ के बीच में बिथोवन ने अपनी स्वयं की कला-साधना के कारण ख्याति प्राप्त की है।Ó शिष्य के अंतरंग मित्र को कहे गए ये शब्द बिथोवन की प्रशस्ति नहीं, वरन् संकल्प, साधना तथा श्रम की गरिमा बताते हैं। बिथोवन को अपने जीवन में किसी का सहारा नहीं मिला। शराबी पिता द्वारा प्रताडि़त किया गया। प्रकृति ने उसे अंधा-बहरा बना दिया, पर वाह रे! धुन के धनी, संकल्पों के कुवेर, हारना तो उसने नहीं सीखा था। संगीत को बिथोवन की इस साधना ने अमर बना दिया, साथ ही उसके नाम को भी। वस्तुत: जिन्होंने विद्या की पूंजी पुरुषार्थ से उपलब्ध की, वे अनेकों के लिए प्रेरणाोत बनते हैं। उनकी यह निधि सारे विश्व के धनकोषों में रखी राशि से भी अमूल्य है।