मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की कथा के दुर्लभ प्रसंग
   Date09-Nov-2019

धर्मधारा
(गतांक से आगे)
आभिजात्यं हि ते मन्ये यथा मातुस्तथैव च।
न हि निम्बात् स्रवेत क्षौद्रं लोके निगदितं वच:।।
वा.रा. अयोध्याकाण्ड सर्ग 35-17
श्रीराम के वनगमन के समय मंत्री सुमन्त्रजी कैकेयी से कहते हैं कि हे कैकेयी! मैं समझता हूँ कि तुम्हारी माता का अपने कुल (वंश) के अनुरूप जैसा स्वभाव था, वैसा ही तुम्हारा भी है। लोक में जानने वाली यह कहावत सत्य ही है कि नीम से मधु (शहद) नहीं टपकता है। सुमन्त्रजी दशरथजी के मात्र मंत्री ही नहीं वरन् दशरथजी के मित्र सखा-सारथी एवं परिवार के सदस्य थे, जिन्हें राजा के महल में कहीं भी आने जाने का विशेषाधिकार था। इस तथ्य को यहाँ एक कथा प्रसंग द्वारा इस रामायण में स्पष्ट देखा जा सकता है। श्रीराम के वनगमन के पूर्व सुमन्त्रजी ने कैकेयी को इस दुष्कृत्य हेतु फटकार लगाई तथा उसकी माता के इस कथा के माध्यम से चरित्र का वर्णन किया है- तव मातुरसद्ग्राहं विद्म पूर्वं यथा श्रुतम्।
पितुस्ते वरद कश्चित् ददौ वरमनुत्तमम्।।
वा.रा. अयो. सर्ग 35-18
तुम्हारी माता के दुराग्रह की बात भी हम जानते हैं। उनके बारे में पहले जैसा कहा सुना गया है, वह बताया गया है। एक समय किसी साधु ने तुम्हारे पिता को एक श्रेष्ठ वर दिया था-
सर्वभूतरुतं तस्मात् संजज्ञे वसुधाधिप:
तेन तिर्यग्गतानां च भूतानां विदितं वच:।।
वा.रा.अयो. सर्ग 35-18
उस वर के प्रभाव से कैकेय नरेश समस्त प्राणियों की बोली समझने लगे। तिर्यक योनि में पड़े हुए प्राणियों की बातें भी उनको समझ में आ जाती थी। एक समय की बात है कि-
पितुस्ते विदितो भाव: स: तत्र बहुधाहसत्।। वा.रा.अयो.सर्ग 35-19
एक दिन कैकेय नरेश शैय्या पर लेटे थे। उसी समय जृम्भ नामक पक्षी की आवाज उनके कानों में पड़ी। उसकी बोली का अभिप्राय वे समझ गए, अत: वे कई बार हँसने लगे। उसी शय्या पर तुम्हारी माँ भी सोयी थी। वह यह समझ बैठी कि राजा उसकी हँसी उड़ा रहे हैं। अत: क्रोधित होकर गले में मौत की फाँसी लगाने की इच्छा रखती हुई बोली-हे सौम्य! (क्रमश:)