मुख्य न्यायाधीश की स्वीकारोक्ति...
   Date08-Nov-2019

राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर असम में प्रभावी रूप से जो प्रक्रिया चल रही है...उसको भले ही ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में, केरल में कम्युनिस्ट, उत्तरप्रदेश-महाराष्ट्र में सपा, बसपा व राकांपा और कांग्रेस देशभर में मुद्दा बनाकर तुष्टिकरण के जरिए मुस्लिम वोटों विशेष रूप से घुसपैठियों का समर्थन हासिल करना चाह रही हो..,लेकिन इस मामले में एनआरसी को प्राथमिकता से लागू करने में भाजपा ने पूरी प्रतिबद्धता दिखाई है...तभी तो असम में दूसरे दौर की एनआरसी सूची भी जारी हो चुकी है...और करीब 19 लाख से ज्यादा लोगों को भारत में अवैध नागरिक मानकर असम में चिन्हित किया गया है...इस दिशा में भाजपा अब यहां तक कह रही है कि भविष्य में एनआरसी को पूरे देश में लागू किया जाएगा...यानी देशभर से घुसपैठियों की शनै: शनै: ही सही विदाई तय है...इस बीच पहली बार और मुखरता के साथ वर्तमान मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई जो कि 17 नवंबर को अपने पद से मुक्त हो जाएंगे...उन्होंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में यह स्वीकार करके राष्ट्रहित में बड़ी पहल की है कि असम में एनआरसी की सख्त जरूरत थी...यही नहीं उन्होंने इस राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का बचाव करते हुए भविष्य में इसे राष्ट्रीयता के मामले में मजबूत दस्तावेज भी निरुपित किया...
ध्यान रखना चाहिए कि असम से वास्ता रखने वाले मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई उच्चतम न्यायालय की उस पीठ के अध्यक्ष है..,जो राज्य में एनआरसी प्रक्रिया की निगरानी कर रही है...यही नहीं मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने एनआरसी पर टिप्पणी करने वाले उन विशेषज्ञों पर भी निशाना साधा...जिन्हें जमीनी हकीकत की जानकारी नहीं है और वे एनआरसी को खिलवाड़ बताने का बेजा बयानी कृत्य कर रहे हैं...न्यायाधीश ने माना कि एनआरसी को लेकर कुछ लोग जमीनी हकीकत से अनजान ही नहीं है..,बल्कि इसको लेकर विकृत तस्वीर भी प्रस्तुत करते रहे है...जिससे असम के विकास का एजेंडा भी प्रभावित हुआ है...मुख्य न्यायाधीश के एनआरसी पर तथ्य व तर्क के संदर्भ में बात सही भी है..,क्योंकि हर जगह गलतियां, कमियां ढूंढऩा और संस्थानों को नीचा दिखाने की यह घातक इच्छाशक्ति रुकना चाहिए..,क्योंकि यह अनेक बार बेहतर कार्यों और व्यवस्थाओं को भी अराजक व्यवस्था में परिवर्तित करने का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष काम करता है...एनआरसी का विषय कोई भाजपा शासन आने के बाद इजाद किया गया हो या इसे अमल में लाया गया है ऐसा नहीं है..,क्योंकि इसका विचार 1951 और 1985 में हुआ था...जब असम समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे अगर कहे कि वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में मोदी सरकार जो एनआरसी व्यवस्था लागू कर रही है वह 1951 के एनआरसी का ही अद्यतन या कहे परिष्कृत रूप है...मुख्य न्यायाधीश ने यहां तक कहा कि एनआरसी की तैयारी के लिए विभिन्न समय सीमाओं को दिल से स्वीकार करने के लिए असम के लोगों की तारीफ करना चाहिए...और उन गैर जिम्मेदार मीडिया घरानों, रिपोर्टिंग संस्थानों को इसकी आलोचना से बचना चाहिए...क्योंकि एनआरसी के जरिए ही असम में अवैध प्रवासियों की संख्या स्पष्ट हो सकती थी...ध्यान रखना चाहिए कि असम में 3.3 करोड़ से अधिक लोगों ने एनआरसी में नाम शामिल करने के लिए आवेदन दिया था...31 दिसंबर 2017 को जारी मसौदे में 1.9 करोड़ लोगों के नाम जोड़े गए...31 अगस्त 2019 को प्रकाशित अंतिम सूची में 3.11 करोड़ लोगों के नाम एनआरसी में डाले गए...इस तरह करीब 19 लाख नामों को एनआरसी से बाहर किया गया है...जस्टिस गोगोई का यह दावा भाजपा को एनआरसी मामले में ज्यादा मजबूती स्थिति में खड़ा कर रहा है कि एनआरसी भविष्य का आधार दस्तावेज होगा...यह मुख्य न्यायाधीश की सादगी व सच के प्रति स्वीकारोक्ति है...
दृष्टिकोण
भविष्य की सलाह व संकेत...
देश के सर्वोच्च न्याय मंदिर के 47वें मुख्य न्यायाधीश पद के लिए मनोनीत हो चुके न्यायमूर्ति शरद अरविंद बोबडे ने एक साक्षात्कार में न्याय प्रक्रिया, न्यायालयीन जिम्मेदारी और न्यायाधीशों के दायित्वों के साथ ही उनसे जुड़े सोशल मीडिया से संदर्भित मामलों को लेकर जो बातें कही वह भविष्य में न्यायालय और न्यायाधीशों की छवि बनी रहे...इसकी सलाह और इस संदर्भ में सोशल मीडिया व अन्य साधनों के जरिए कोई गड़बड़ी न हो इसकी सावधानी रखने का संकेत छुपा है...क्योंकि इसके जरिए उन्होंने भविष्य की अपनी उस रणनीति का भी खुलासा कर दिया है जिसमें उन्हें अपनी न्याय प्रक्रिया, न्यायायिक दायित्व और अपने जैसे ही तमाम न्यायाधीशों के ओहदे के सम्मान का पूरा ध्यान है...न्यायामूर्ति बोबडे ने कहा कि अनेक बार फैसलों के बजाए न्यायाधीशों की सोशल मीडिया पर जो आलोचना का बेतुका ढर्रा प्रारंभ हो चुका है वह न्याय कार्य को न केवल प्रभावित करता है..,बल्कि उसे संदिग्ध बनाता है...बात सही भी है न्यायाधीश या फिर किसी पीठ ने अगर किसी मामले पर कोई निर्णय दिया है तो वह उसके बहुत वृहद संदर्भ में रहता है जिसको सोशल मीडिया पर हंसी या मस्करी वाली आलोचना का पात्र बनाने का अधिकार किसी को नहीं है...बात सही भी है न्यायाधीशों की प्रतिष्ठा को किसी मामले या विषय के संदर्भ में लांछन लगाने या उसे दागिल करार देने से पहले ऐसे लोगों को स्वयं का आकलना करना चाहिए...