बुढिय़ा की झोपड़ी
   Date08-Nov-2019

प्रेरणादीप
किसी राजा ने एक जगह अपना महल बनवाया। उसके बगल में एक गरीब बुढिय़ा की झोपड़ी थी। झोपड़ी का धुआं महल में जाता था, इसलिए राजा ने बुढिय़ा को अपनी झोपड़ी वहां से हटा लेने की आज्ञा दी। राजा के सिपाहियों ने बुढिय़ा से झोपड़ी हटा लेने को कहा, पर उसने कोई उत्तर नहीं दिया। तब वे लोग उसे डांट-डपटकर राजा के पास ले गए। राजा ने पूछा- 'बुढिय़ा! तू झोपड़ी हटा क्यों नहीं लेती? मेरा हुक्म क्यों अमान्य करती है? बुढिय़ा ने कहा-'महाराज! आपका हुक्म तो सिर माथे पर, पर आप क्षमा करें, मैं एक बात आप से पूछती हूं। महाराज! मैं तो आपका इतना बड़ा महल और बाग-बगीचा सब देख सकती हूं, पर आपकी आंखों में मेरी यह टूटी झोपड़ी क्यों खटकती है? आप समर्थ हैं, गरीब की झोपड़ी उजड़वा सकते हैं, पर ऐसा करने पर क्या आपके न्याय में कलंक नहीं लगेगा।Ó बुढिय़ा की बात सुनकर राजा लज्जित हो गए और बुढिय़ा को धन देकर उसे आदरपूर्वक लौटा दिया।