विदेश में बेहतर भविष्य की तलाश का कड़वा सच
   Date08-Nov-2019

भगवती प्रसाद डोभाल
रोजगार की तलाश में लोग देश छोडऩे तक को मजबूर हो जाते हैं। इनमें कुशल कारीगर, मजदूर तो होते ही हैं, साथ ही अपने क्षेत्र के पारंपरिक विशेषज्ञ भी होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी अपने काम और कौशल को आगे बढ़ाते हैं, पर साधनों के अभाव में देश में न रुक कर दूसरे मुल्कों का रास्ता तलाशते हैं। कुछ लोग वे हैं जो इंजीनियरिंग, डॉक्टरी, प्रबंधन की शिक्षा के लिए बैंकों से लिए कर्ज को लौटाने के लिए जल्दी रोजगार ढंूढऩे की कोशिश करते हैं। उन्हें यदि देश में रोजगार नहीं मिलता तो उनके पास एक ही चारा बचता है कि देश से बाहर निकला जाए। जहां वे अपनी शिक्षा का भरपूर उपयोग करने की इच्छा रखते हैं।
जब बाहर जाने में उन्हें वीजा आदि की जरूरत होती है, तब कोई वैधानिक रास्ता न मिलने के कारण वे गैरकानूनी तरीके अपनाते हैं और दलालों के चक्कर में फंस जाते हैं। ऐसे हजारों मामले लगातार सामने आते रहे हैं। बहुत तो दूसरे देशों में पहुंचने में कामयाब हो जाते हैं। एक बार वे किसी तरह उस देश में घुस जाएं, जहां रोजगार की संभावना है तो किसी न किसी तरह वे उस देश में जुगाड़ कर ही लेते हैं। बहुत से ऐसे उदाहरण हैं जो किसी न किसी बहाने चोरी-छिपे दूसरे देश में पहुंचे और फिर वहीं के हो गए। भारतीय नागरिकों के लिए कनाडा भी एक ऐसा ठिकाना रहा है, जहां वे रोजगार की तलाश में पहुंचे हैं और वहीं बस गए हैं।
ब्रिटिश काल में यानी गुलामी के दौरान अंग्रेज भारत से सस्ते मजदूरों के रूप में हजारों भारतीयों को दूसरे देशों और द्वीपों में ले गए थे। इन मजदूरों के साथ भारत की सांस्कृतिक परंपरा भी दूसरे देशों में जाती रही। तब के इन मजदूरों ने उन देशों को अपने बाहुबल से समृद्ध तो किया ही है, साथ ही वहां के राजनीतिक जीवन में सक्रिय भी हैं। उच्च पदों पर भी आसीन हैं। सर शिवसागर रामगुलाम जैसे कई बड़े नाम हैं जो प्रधानमंत्री तक बने हैं, वे 2005 से 2014 तक मारिशस के प्रधानमंत्री रहे थे। हाल में कनाडा में भी उपप्रधानमंत्री एक सिख बने हैं। ये वे लोग हैं जो वर्षों पहले भारत से चले गए थे, पर उनके मन में एक भावनात्मक लगाव अभी भी बरकरार है, चाहे इस देश में उन्हें रोजी-रोटी नहीं मिली, पर यह उनके पूर्वजों की जन्मस्थली है। इस बात को वे भूले नहीं हैं।
आज भी अनपढ़ से लेकर पढ़ा-लिखा बेरोजगार, रोजगार पाने के लिए उत्सुकता से विदेश जाने की कोशिश कर रहा है। इसी कारण विदेश में जाने के लिए वे दलालों के चंगुल में फंस रहे हैं। हाल की एक घटना है, जब मैक्सिको से तीन सौ भारतीयों को विशेष विमान से भारत वापस भेजा गया। ये सभी कामकाज के लिए अवैध रूप से भारत छोड़ कर गए थे और मैक्सिको के रास्ते अमेरिका में घुसना चाहते थे। इन सभी लोगों ने दलालों को पच्चीस से तीस लाख रुपए अमेरिका जाने के लिए दिए थे। ऐसे ही हजारों लोग पिछले कई वर्षों से लगातार खाड़ी देशों और दूसरे देशों में जाने के लिए दलालों के चंगुल में फंसते रहे हैं। इनमें पंजाब के नौजवानों की संख्या ज्यादा है जो अपनी खेती-बाड़ी, जमीन बेच कर विदेश जाने का सपना पूरा करते हैं। लेकिन ज्यादातर लोगों के साथ होता यही है कि वे दलालों के चंगुल में फंसे रहते हैं और विदेश में अवैध रूप से घुसने के मामले में वहां की कानूनी कार्रवाई का सामना करते हैं और इनमें से कई को तो जेल तक की हवा खानी पड़ जाती है। बाद में भारतीय दूतावासों की मदद से ये लोग छूटते हैं और वापस खाली हाथ अपने घर लौटने को मजबूर होते हैं। अवैध रूप से दूसरे देशों को जाने वाले लोग एक नहीं बल्कि कई देशों के चक्कर काटते हुए अपने गंतव्य तक पहुंच पाते हैं। अवैध रूप से अमेरिका जाने की कोशिश करने वाले लोगों ने बताया कि इक्वाडोर जाने से पहले उन्हें दुबई ले जाया गया, वहां से रूस के लिए उड़े, रूस से पूरा समूह दो महीने इक्वाडोर में रुका और फिर वहां से वे ग्वेटेमाला पहुंचे और पूरी रात जंगलों में बिताई। फिर इनमें से कुछ ने मैक्सिको के लिए वाहन किया, क्योंकि मैक्सिको की सीमा से ही वे अमेरिका में घुस सकते थे। यहां से सीमा पार करने के लिए दो घंटे का पैदल रास्ता तय किया, ताकि सीमा पर पुलिस नजरों से बच कर अमेरिका में कदम रख सकें।
यूरोप और अमेरिका के लिए रोजगार की तलाश में अवैध तरीके से जाने के मुख्य चार भूमध्य मार्ग हैं। यहां से सिर्फ भारत के लोग नहीं जाते, बल्कि दुनिया के किसी भी देश से वहां पहुंचा जा सकता है। इनमें एक है पूर्वी भूमध्य मार्ग, यह रास्ता तुर्की से होता हुआ जाता है और पूर्वी यूरोप में खुलता है। साल 2011 से जब से सीरिया में युद्ध शुरू हुआ, तब से यह रास्ता भीड़भाड़ वाला हो चुका है। दूूसरा भूमध्य सागर मार्ग है। इस रास्ते से दस देशों की जनता यूरोप में पहुंचती है। ये देश हैं-सीरिया, अफगानिस्तान, नाइजीरिया, पाकिस्तान, इराक, सोमालिया, सूडान, जांबिया और बांग्लादेश। तीसरा रास्ता रोजगार की तलाश में अमेरिका जाने का अवैध रूप से केंद्रीय रास्ता है। यहां से अक्सर तस्करी की जाती है, नशीली दवाओं का अवैध धंधा दुनियाभर में यहीं से चलता है। इसका नियंत्रण अमेरिकी सीमा पर होता है। चौथा दक्षिण पूर्व एशिया का मार्ग है, जो राजनीतिक उथल-पुथल, प्रतिबंधात्मक प्रवासन नीतियों से वंचित है और इसने शरणार्थियों के कारण कानूनी ढांचे की कमियों से दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रवासियों के लिए खतरा पैदा कर दिया है। विकसित देशों में जो प्रवासी आज मौजूद हैं, उनका यदि सर्वेक्षण किया जाए तो पता चलेगा कि कितने प्रवासी शरणार्थी हैं और कितने अवैध तरीके से वहां रह रहे हैं। लेकिन वास्तविकता में यदि पहचान करने की नौबत आती है तो वे शीघ्र ही अंतर्राष्ट्रीय सीमा को पार करने में देरी नहीं करते। जो शरणार्थी हैं, उन्हें तो अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार रहने की अनुमति मिल सकती है, पर जो सीमाओं को चोरी-छिपे लांघ कर वहां पहुंचे हैं, उन्हें उस देश से शीघ्र भगाया जा सकता है, उन्हें वहां कोई वीजा नहीं दिया जा सकता है। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपना देश और घर किन्हीं अन्य कारणों से छोड़ते हैं और अवैध रूप से दूसरे देश में जाने को मजबूर हो जाते हैं। कई बार लोग अपना देश गृह युद्ध, अन्य आंतरिक संकटों के कारण छोड़ते हैं, या फिर अर्थव्यवस्था चरमराने के बाद बिगड़े हालात के कारण दूसरे देश में जाना चाहते हैं। लेकिन उन्हें 1951 की शरणार्थी संधि के आधार पर उस देश में रखने का प्रावधान नहीं है, जहां वे रोजगार के लिए शरण लेने गए हों। ऐसे में अधिकांश देश ऐसे लोगों को अपने यहां शरण नहीं देते और उन्हें उनके देश वापस भेज देते हैं। ऐसे देशों में ग्रीस, रूस, जर्मनी, स्वीडन, नीदरलैंड, पोलैंड, हंगरी, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, जापान, ब्रिटेन, इजराइल, कनाडा, इटली, फ्रांस, स्पेन, अमेरिका और मैक्सिको हैं।
चोरी-छिपे और गैरकानूनी रूप से दूसरे देशों में जाने वालों को उस देश में कभी भी सम्मान की नजरों से नहीं देखा जाता। ऐसे में बेहतर यही होता है कि दूसरे देशों के आकर्षण और ज्यादा पैसे के प्रलोभन में दलालों के चंगुल में न फंसा जाए। यह सरकारों की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने देश में ही युवाओं को रोजगार मुहैया कराएं, ताकि लोगों को काम-धंधे के लिए दूसरे देशों का मुंह न ताकना पड़े और दलालों के चंगुल से बच सकें।
इसके साथ ही रिपोर्ट में कहा गया है इस इलाके में दूसरे देशों से आ रहे आप्रवासियों का स्वागत करने में रूस सबसे आगे है। 2013 में यहां 1 करोड़ 10 लाख के करीब आप्रवासी पहुंचे. इसके बाद ऑस्ट्रेलिया, भारत, पाकिस्तान, थाइलैंड, कजाकिस्तान, चीन, ईरान, मलेशिया और फिर जापान का स्थान आता है। रिपोर्ट के मुताबिक इस क्षेत्र के अधिकतर आप्रवासी नजदीकी देशों में जाते हैं। ऐशिया प्रशांत इलाके के भीतर ही इनमें से 5 करोड़ 9 लाख के करीब आप्रवासी गए हैं. इसके अलावा अन्य आप्रवासियों ने काम करने के लिए मध्य पूर्व और उत्तरी अमेरीका जैसे दूसरे देशों को चुना है। हर साल तकरीबन 2 करोड़ लोगों को विदेशों में भेजने वाले फिलिपिंस के आप्रवासियों का जिक्र करते हुए हाम कहते हैं कि फिलिपिंस अपने आप्रवासियों को विदेश जाने के लिए प्रेरित करता है और जब वे वापस लौटते हैं, तो भी उन्हें उनके जीवन को अपने देश के मुताबिक ढालने में मदद करता है।