ज्ञान, कर्म व भक्ति, मोक्ष व मुक्ति के बीज
   Date07-Nov-2019

धर्मधारा
म नुष्य जन्म बड़े भाग्य से मिलता है। चौरासी लाख योनियों में मनुष्य जन्म को ही देवदुर्लभ कहते हैं, क्योंकि मनुष्य को छोड़कर अन्य सभी योनियों को भोग योनि कहा गया है। भोग योनि में रहकर जीव भोगों के बंधन में पड़ा रहता है। वह भोगों को भोगने के लिए विवश होता है, क्योंकि भोगों के बंधन से मुक्त होने की उसमें अभीप्सा ही नहीं होती है, अभिलाषा ही नहीं होती है। एक पशु स्वाभाविक रूप से भोगों को भोगने के लिए बाध्य होता है, विवश होता है। उसमें न तो मुक्ति की अभीप्सा है और न ही अभिलाषा। इसलिए वह कोटिश: जन्मों तक प्रारब्धजन्य भोगों के बीच असहाय अवस्था में ही पड़ा रहता है। इसमें विपरीत मनुष्य योनि, भोग योनि नहीं, बल्कि कर्म योनि है। मनुष्य जन्म में कर्म करने की स्वतंत्रता है। मनुष्य जन्म में रहते हुए जीव अपने शुभ व पुण्यकर्मों के द्वारा अपने जीवन को सुखी व सुंदर बना सकता है। साथ ही निष्काम कर्म, ज्ञान, भक्ति आदि के द्वारा अपनी मुक्ति का मार्ग भी वह प्रशस्त कर सकता है। वह जीवन व मृत्यु के बंधन से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्त होकर मोक्ष व मुक्ति का अधिकारी हो सकता है। वह सत्-चित्-आनंद, परमानंद, ब्रह्मानंद की स्थिति की प्राप्ति कर सकता है। निस्संदेह इस जीवन में ही वह ईश्वर की प्राप्ति भी कर सकता है। वह इस धरा को भी स्वर्ग बना सकता है। यह जन्म व्यर्थ में नष्ट करने योग्य नहीं है। यदि इस जन्म में ईश्वर की प्राप्ति न हो सकी तो मनुष्य जन्म की इससे बड़ी हानि भला क्या हो सकती है? जीवन के प्रारंभ से ही हमें अपने जीवन के परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होते रहना चाहिए, क्योंकि जैसे एक छोटे से बीज से ही एक नन्हा-सा पौधा निकलता है और अंतत: एक बहुत बड़े वृक्ष का रूप धारण कर लेता है, वैसे ही एक नन्हा-सा ध्रुव, एक नन्हा-सा प्रहलाद, एक नन्हा-सा शंकर ही ज्ञान, कर्म व भक्ति से पोषित होकर, पुष्पित व पल्लवित होते हुए अंतत: विराट वृक्ष बन पाता है। वह छोटा सा बालक इसी तरह एक दिन विराट पुरुष, महापुरुष बन जाता है तथा मोक्ष, मुक्ति व ईश्वर की प्राप्ति कर पाता है और पूरी विश्वसुधा को धन्य कर पाता है। जीवनभर विषय भोगों के पीछे भागते-भागते अचानक जीवन की संध्या आ ही जाती है, तब सचमुच हम चाहकर भी कुछ करने की स्थिति में नहीं होते, क्योंकि तब तक हमारी इंद्रियां भोगों की ओर उनमें अनुरक्ति ही नहीं होती, प्रवृत्ति ही नहीं होती।