भारतीय सेना के पराक्रम से पस्त पाकिस्तान
   Date06-Nov-2019

प्रमोद भार्गव
भा रतीय सेना ने चार साल के भीतर तीसरी बार साहसिक पराक्रम का परिचय दिया है। पाकिस्तान के पाक अधिकृत कश्मीर में मौजूद आतंकी ठिकानों पर कड़ा प्रहार करके जता दिया है कि अब वह अपने जवानों की शहादत का बदला लेने के लिए किसी भी हद से गुजर सकता है। दरअसल इस हमले के एक दिन पहले पाक सेना ने भारतीय सीमा में आतंकियों की घुसपैठ कराने के लिए कुपवाड़ा में अकारण गोलीबारी की थी जिसमें दो भारतीय सैनिक पद्म बहादुर श्रेष्ठ एवं गामिल कुमार शहीद हो गए थे। एक नागरिक भी मारा गया था। इस घटना से भारतीय सेना ने तंगधार सेक्टर के सामने नियंत्रण रेखा के पार तोपों से गोले दागकर पीओके की नीलम घाटी के जूरा, ऐथमुकाम और कुंदलशाही में स्थित तीन आतंकी शिविरों को तबाह कर दिया। इन नापाक ठिकानों में जैशए-मोहम्मद व हिजबुल मुजाहिद्दीन के प्रशिक्षण शिविर थे। इन्हें आर्टिलरी एवं बोफोर्स तोपों से नेस्तनाबूद किया गया। इन शिविरों में मौजूद पाक सेना के 10 जवान और 35 आतंकी ढेर होने की खबर है।
भारत ने पाक पर पहली 'सर्जिकल स्ट्राइकÓ उरी हमले के बाद सितंबर 2016, दूसरी 'एयर स्ट्राइकÓ बालाकोट में पुलवामा हमले का जवाब देने के लिए फरवरी 2019 और अब यह 'आर्टिलरी स्ट्राइकÓ 20 अक्टूबर 2019 को की है। थल सेना प्रमुख विपिन रावत ने कहा है कि आतंकियों के चौथे शिविर को तो भारी नुकसान हुआ ही है, आतंकी संरचना और शिविरों की इमारतें भी ध्वस्त हुई हैं। दरअसल बर्फबारी होने से पहले पाक सेना की मंशा बड़ी संख्या में भारतीय सीमा में आतंकियों की घुसपैठ कराना थी, जो नाकाम हो गई। इस स्ट्राइक के अनेक दृश्य व छाया-चित्र भी जारी हो गए हैं, इसलिए इस हमले पर विपक्षी दलों द्वारा सवाल खड़े करना मुश्किल है। फिर भी वे ऐसा कुछ करते हैं तो यह संदेह उन्हें ही नुकसान पहुंचाने का काम करेगा। साफ है, पाकिस्तान को अब समझ जाना चाहिए कि उसकी हर हरकत का अब मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। अलबत्ता नेतृत्व की इच्छाशक्ति और सेना के दुस्साहस का ही यह परिणाम है कि सेना लक्ष्मण रेखा लांघकर पीओके की जमीन पर खड़े होकर जवाबी हमला करने में सक्षम दिखाई दे रही है।
दरअसल पाक पिछले तीन दशक से अपने नापाक मंसूबों को आतंक के जरिए भारत की धरती पर जिस तरह से अंजाम देने में लगा था, उस नाते पाक को भारतीय सेना की ताकत और राजनीतिक इच्छाशक्ति की दृढ़ता दिखाना जरूरी था। इस कार्यवाही से अब यह संदेश जाएगा कि आतंकी पाकिस्तानी सीमा में भी सुरक्षित नहीं हैं। आतंकी शिविरों पर की गईं इन सीमित कार्यवाहियों ने पाक समेत पूरी दुनिया को पैगाम दे दिया है कि भारतीय फौज का आत्मबल तो मजबूत है ही, वह हर प्रकार के हमले करने में भी दक्ष है। इससे यह भी संदेश गया है कि सेना और देश के नेतृत्व का रुख अब रक्षात्मक की बजाय आक्रामक हो गया है। दरअसल धारा-370 के खात्मे के बाद पाक बौखलाया हुआ है। उसकी मंशा है कि घाटी में जिस तेजी से शांति की बहाली हो रही है उसमें दखल देना जरूरी है जिससे स्थानीय लोगों को भड़काने में वह किसी तरह सफल हो जाए। नतीजतन दुनिया में यह संदेश चला जाए कि इस अनुच्छेद की समाप्ति से जनता में रोष है।
इसीलिए वह घुसपैठियों की मदद से हिंसक वारदातें करने में लगा है। पाक ने फिलहाल पीओके में 28 से ज्यादा आतंकी शिविरों में 350 से भी ज्यादा प्रशिक्षित आतंकी इक_े कर लिए हैं, जो बर्फबारी होने के साथ ही घाटी में घुसपैठ कर उसका मिजाज बिगाडऩे को तत्पर हैं। दरअसल एक पखवाड़े के अंदर नियंत्रण रेखा के ज्यादातर इलाकों में बर्फबारी शुरू हो जाएगी। इसीलिए वह बार-बार संघर्ष विराम भी तोड़ रहा है। इसी साल अक्टूबर तक 2300 से भी अधिक बार वह संघर्ष विराम का उल्लंघन कर चुका है। यह आंकड़ा बीते पांच सालों में सर्वाधिक है। 2018 में 1629 बार पाक ने संघर्ष विराम तोड़ा था। उरी, बारामूला और तंगधार क्षेत्रों में भी पाक सेना लगातार गोलीबारी करती रहती है। कश्मीर मुद्दे पर चीन भी पाक का खुला समर्थन नहीं दे रहा है। जो अन्य देश दबी जुबान से उसका साथ देते दिख रहे हैं, वे भी एकाध मर्तबा बयान देकर पीछे हट गए हैं। नतीजतन पाक को ताकत किसी भी देश से नहीं मिल पाई है। इसी बीच पाक की अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भी नाकामी खुलकर सामने आ गई है। साथ ही इमरान अपनी नाकामियों के चलते घरेलू मोर्चे पर भी बुरी तरह घिर गए हैं। उनके खिलाफ पूरे देश में प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनमें उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाने की मांग की जाने लगी है।
वैसे भी पाक की यह स्थाई समस्या रही है कि वहां किसी भी प्रधानमंत्री की हैसियत सेना प्रमुख से ज्यादा नहीं आंकी जाती है। इसीलिए सेना और पाक की खुफिया एजेंसी आईएसआई का शिकंजा हमेशा चुने गए प्रधानमंत्री पर कसा रहता है। सेना अपना वजूद बनाए रखने के लिए नियंत्रण रेखा का उल्लंघन, आतंकियों की घुसपैठ और घाटी में अस्थिरता बनाए रखने का काम 30 साल से जारी रखे हुए है। तीन-तीन लक्षित हमलों और अनुच्छेद 370 के एक झटके में खात्मे के बाद उसे लगने लगा है कि भारत में अब नापाक मंसूबो को फैलाने का दौर समाप्त होने जा रहा है। भारतीय सेना के मजबूत इरादों के सामने उसका टिके रहना मुमकिन नहीं है। इसलिए वह अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए किसी भी घटिया हरकत से गुजरने को तैयार है। ऐसे में हमें पाक की हर छिपी हरकत पर निगाह रखना और उसका लक्षित हमलों के रूप में जवाब देना जरूरी हो गया है। पाक द्वारा प्रायोजित छाया युद्ध का यही माकूल जवाब है। आतंकी शिविरों को नष्ट करने के बाद खास बात यह भी रही है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदायों का समर्थन भारत के साथ दिखाई दे रहा है। इसलिए भारत को अवसर का लाभ उठाते हुए 'मत चूके चौहानÓ कहावत को चरितार्थ करने की दृष्टि से लक्षित हमले करते रहना चाहिए।
अभी तक सर्जिकल स्ट्राइक में अमेरिका और इजराइल की सेना को ही पेशेवर दक्षता हासिल थी लेकिन अब पीओके में तीन हमलों को अंजाम देकर भारतीय सेना ने जता दिया है कि उसने भी सर्जिकल स्ट्राइक ऑपरेशन की कुशलता हासिल कर ली है। हालांकि भारत म्यांमार में भी इसी तरह का ऑपरेशन कर चुका है। जिसमें भारतीय सेना ने 38 नगा उग्रवादियों को म्यांमार की सीमा में घुसकर मौत के घाट उतार दिया था। हालांकि यह ऑपरेशन म्यांमार सरकार की सहमति से हुआ था। अमेरिका इस तरह के
ऑपरेशन इराक में सद्दाम हुसैन और पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन को ठिकाने लगाने की दृष्टि से कर चुका है। इंदिरा गांधी के कार्यकाल 1971 में जब भारत और पाक के बीच युद्ध हुआ था, तब भारत के सशस्त्र बलों ने नियंत्रण रेखा को पार किया था। लेकिन 1999 में करगिल युद्ध के दौरान प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सेना को नियंत्रण रेखा पार करने की अनुमति देने से इंकार कर दिया था। ऐसा उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते किया था। किंतु अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में सेना को खुली छूट मिल गई है। दरअसल जनवरी 2004 में पाकिस्तान ने भरोसा दिलाया था कि वह अपनी जमीन पर आतंकवाद को पनपने नहीं देगा, किंतु ऐसा करने के बजाय उसने आतंक की पूरी बेल को ही सींचने का काम निरंतर किया। इस लिहाज से भारत के लक्षित हमले पाकिस्तान को सबक सिखाने की दृष्टि से जरूरी हैं।