बुद्धि को नियंत्रित करती है श्रद्धा
   Date06-Nov-2019

धर्मधारा
वि शुद्ध बुद्धिवादी के पास स्नेह, सौजन्य, सौहार्द, सहानुभूति, भ्रातृत्वभाव जैसी कोमलताएँ नहीं होतीं। इन मानवीय गुणों की जननी श्रद्धा ही है। श्रद्धालु अंत:करण वाला मनुष्य सेवा-सहयोग, क्षमा-दया, परोपकार तथा परमार्थ में विश्वास करता है, न्याय और नियम उसकी विशेषताएँ हुआ करते हैं। मानवता के इतिहास में दो परस्पर विरोधी व्यक्तित्वों के नाम पाए जाते हैं। एक वर्ग तो वह है जिसने संसार को नष्ट कर डालने, जातियों को मिटा डालने तथा मानवता को जला डालने का प्रयत्न किया है। दूसरा वर्ग वह है जिसने मानवता का कष्ट दूर करने, संसार की रक्षा करने, देश और जातियों को बचाने के लिए तप किया है, संघर्ष किया है और प्राण दिए हैं। इतिहास के पन्नों पर आने वाले यह दोनों वर्ग निश्चित रूप से बुद्धिबल वाले रहे हैं। अंतर केवल यह रहा है कि श्रद्धा के अभाव में एक की बुद्धि अनियंत्रित होकर केवल बर्बरता का प्रदर्शन कर सकी है और दूसरे का बुद्धिबल श्रद्धा द्वारा नियंत्रित होने से सज्जनता का प्रतिपादन करता रहा है। यदि आज की चमत्कारिणी बुद्धि का ठीक दिशा में उपयोग करना है, संसार से दु:ख-दर्द को मार भगाना है, अपनी धरती माता को स्वर्ग बनाना है, मानव सभ्यता की रक्षा के साथ-साथ उसका विकास करना है तो अंत:करण में श्रद्धा की प्रतिस्थापना करनी होगी। श्रद्धा ही एक ऐसा प्रकाश है, जो मनुष्य को अनंत अंधकार में खोने से बचा सकता है। श्रद्धावान को जहाँ अपने प्रति स्नेह रहता है, वहाँ दूसरों के प्रति भी। आज बुद्धि के अतिरेक के युग में इसी श्रद्धा नामक मानवीय मूल्य का अभाव हो गया है। जिस दिन मनुष्य में श्रद्धा के भाव की बहुलता हो जाएगी, बुद्धिवादिता का नियमन होगा, तब आज के विध्वंसक बौद्धिक चमत्कार-सृजनात्मक वरदान बन जाएंगे। इस प्रकार श्रद्धा से ही बुद्धि का परिष्कार संभव है।
बुद्धि से जीवन की जानकारियाँ मिलती हैं, जीवन के बारे में पता चलता है और ज्यादा कुछ हुआ तो जीवन की समझ मिलती है, परंतु जीवन नहीं मिलता, जीवन का अनुभव नहीं होता। बुद्धि से तर्क बढ़ते हैं, पर ज्ञान नहीं बढ़ता। ज्ञान तो श्रद्धा से मिलता है। ज्ञान तो अनुभव से मिलता है और अनुभव तभी होता है, जब हमारी श्रद्धा प्रगाढ़ होती है।