जहरीली हवा और जिम्मेदारी...
   Date05-Nov-2019

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली दमघोंटू वायु प्रदूषण से दो-चार हो रही है... राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के लोग ही नहीं, बल्कि उसके आसपास का पूरा परिवेश इस जहरीली वायु की गिरफ्त में है... इस जहर से बचने के लिए राहगीर सड़कों पर मॉस्क लगाकर निकलते नजर आते हैं... यह स्थिति उस स्थान की है, जिसे हम राष्ट्रीय राजधानी कहते हैं और जहां पर नियमों-कानूनों को न केवल बनाने, बल्कि उन्हें लागू करने की नीतियां भी मूर्तरूप लेती हैं... यहां की जहरीली वायु का सबक उन लोगों के लिए भी है, जो विभिन्न राज्यों से लोकसभा और राज्यसभा के रूप में चुनकर जनप्रतिनिधि बनकर इन नियमों, कानूनों के निर्माण में महती भूमिका का निर्वाह करते हैं... यहां पर देशभर के राज्यों के चुने हुए मुख्यमंत्री एवं जनप्रतिनिधि, यहां तक कि पंचायत से लेकर नगर परिषद् और नगर पालिका से लेकर नगर निगम या कहें कि सरपंच से लेकर विधायक, सांसद तक सभी को आना पड़ता है... अब उन्हें विचार करना चाहिए कि जिस तरह की आशंकाएं तमाम तरह के प्रदूषण को लेकर जताई जाती हैं, उसका असर भविष्य में दिल्ली से बाहर निकलकर पहले राज्यों के बड़े शहरों अर्थात राजधानियों, फिर शनै: शनै: बड़े से लेकर छोटे शहर, कस्बों तक किस स्तर तक होने वाला है..? तब दिल्ली की भांति भोपाल, इन्दौर, हैदराबाद, अहमदाबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, मुंबई, सभी के यही हाल होंगे, क्योंकि जिस गति से वाहनों की संख्या बढ़ रही है और छोटे-मोटे काम के लिए भी जब वाहनों का बेजा दुरुपयोग हो रहा है, तब स्थितियां सिर्फ वायु प्रदूषण के मान से ही नहीं बढ़ेंगी, बल्कि ध्वनि प्रदूषण, जल प्रदूषण व उन तमाम प्रदूषणों का भी मानव जीवन के लिए दमघोंटू बन जाना स्वाभाविक है, जिनसे अभी छोटे शहर, कस्बे अछूते हैं... क्योंकि दिल्ली के वायु प्रदूषण ने उस बीमारी की तरफ देशवासियों का ध्यान खींचा है, जो धीरे-धीरे पूरी दिल्ली को अपनी गिरफ्त में ले चुकी है...
दिल्ली में भयंकर प्रदूषण की स्थिति से उन छोटे मासूम बच्चों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है, जो सुबह-सुबह स्कूल जाते हैं... उसमें भी उनके लिए सबसे ज्यादा विकट स्थिति निर्मित हो जाती है, जिन्हें दो पहिया या ऑटो से स्कूल जाना पड़ता है... क्योंकि उन्हें खुले में उस जहरीली दमघोंटू हवा का सर्वाधिक सामना करना पड़ता है... निजी व महंगी स्कूलों के उन बच्चों को ज्यादा प्रभाव नहीं होता, जिनके लिए पूर्णत: बंद या ऐसी स्कूल गाडिय़ां चल रही हैं... तभी तो वायु प्रदूषण के बिगड़े हालात ने आपातकाल जैसी स्थिति निर्मित कर दी और इसी के चलते जहरीली वायु प्रदूषण से बचाने के लिए दिल्ली के स्कूलों में अवकाश घोषित करना पड़ा... अब विचार किया जा सकता है कि बच्चों को स्कूल न भेजकर या छुट्टियां घोषित करके जहरीली हवा से शासन-प्रशासन ने बचा लिया, लेकिन क्या बच्चे अब सुबह-शाम और दिन-रात घर में ही टीवी, वीडियो गेम या मोबाइल में अपना दम घुटवाते रहे..? खेल के मैदान में या छत पर न जाएं, कहीं जाना भी हो तो मॉस्क लगाकर जाएं... आखिर यह भी कोई जिन्दगी है..? तभी तो संभवत: सुप्रीम कोर्ट को सोमवार को दिल्ली के जहरीली वायु प्रदूषण पर यह टिप्पणी करना पड़ी कि इस वायु प्रदूषण वाले आपातकाल से तो बेहतर था 1977 का आपातकाल... जिसमें कम से कम सांसों वाला जहरीला धुआं तो दम नहीं घोंट रहा था... बात सही भी है, स्थिति को समझने के लिए वाहनों की संख्या में कमी लाने के प्रयास हर स्तर पर करना होंगे...