आतंकवाद के अंत के लिए दुनिया का एक होना जरूरी
   Date05-Nov-2019

विकेश कुमार बडोला
अ मेरिका में प्रवासियों से भरे ह्यूस्टन शहर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर भले ही आतंक खात्मे का आह्वान दुनिया के सामने रखा हो और इस आह्वान में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भी शामिल हो गए हों, लेकिन यह सच है कि पूरी दुनिया को आतंक के खिलाफ एकजुट होने के लिए शत-प्रतिशत परिणाम देने होंगे। भारतीय प्रवासियों की ओर से आयोजित इस बड़े आयोजन में डोनाल्ड ट्रंप और नरेन्द्र मोदी के जन-सम्बोधन का केन्द्रीय विचार इस्लामिक आतंक के विरुद्ध मिलकर लडऩे का संकल्प भले ही ले लिया हो, लेकिन हकीकत यही है कि वैश्विक आतंकवादी अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहे। वह तालिबानी हों या अन्य पाकिस्तानी आतंकी, उन पर पूरी दुनिया को मिलकर लगाम लगाने के लिए एकजुट होना ही होगा। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी आज एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय हस्ती बन चुके हैं। भारत के आम चुनाव में राजग यानी भाजपा लगातार दूसरी बार बड़े जनादेश से सत्तारूढ़ हुई। मोदी लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र के प्रमुख से यह दूसरी मुलाकात है और इस दौरान दोनों नेताओं द्वारा जो प्रमुख संकल्प प्रकट किया गया, वह इस्लामिक आतंक के विरुद्ध संयुक्त लड़ाई लडऩे का है।
आशा की जानी चाहिए कि इस संकल्प के अनुसार भारत के नेतृत्व में आतंकवाद के विरुद्ध छिड़ी विश्वस्तरीय लड़ाई अवश्य ही निर्णायक मोड़ तक जाएगी। इससे पहले दोनों नेता अगस्त में फ्रांस में जी 7 की वार्षिक बैठक में मिले थे। 2014 में भारत की सत्ता में मोदी और 2016 में अमेरिकी सत्ता में ट्रंप के विराजित होने के बाद वैश्विक आतंक के विरुद्ध अभूतपूर्व अंतर्राष्ट्रीय कार्यनीति, रणनीति और कूटनीति बननी शुरू हुई। राष्ट्रपति प्रत्याशी के रूप में उतरे रिपब्लिकन ट्रंप ने अपने चुनावी अभियान में लोगों को वचन दिया था कि वे अमेरिका को आतंकमुक्त करेंगे, मानवाधिकार की आड़ में अमेरिका में घुसे अराजक मुस्लिम शरणार्थियों को अमेरिका से बाहर करेंगे और अमेरिका फस्र्ट नीति का पालन करेंगे। नि:संदेह चुनाव जीतने के बाद उन्होंने इन चुनावी घोषणाओं पर व्यापक स्तर पर कार्य किया। हालांकि अमेरिका में वर्षों से सत्तारूढ़ डेमोक्रेट सरकार ने आतंक सहित अनेक वैश्विक समस्याओं के संदर्भ में यथास्थिति और स्वार्थपरक तटस्थता का परित्याग कभी नहीं किया, जिसकी हानि भारत जैसे देशों को जम्मू-कश्मीर में और उसके रास्ते भारत में आयातित पाक प्रायोजित आतंक द्वारा समय-समय पर मचाए गए विध्वंस के रूप में उठानी पड़ी। स्मरण करिए 2014 से पहले के भारतीय शासन की विदेश नीति और कूटनीति। आतंक के जनक पाकिस्तान के प्रति अमेरिका सहित दुनिया के अधिसंख्य देशों के पुराने उदार दृष्टिकोण को बदलने में भारत पूरी तरह असमर्थ था। समय-समय पर भारत में हुए आतंकी हमलों की विस्तृत छानबीन के बाद हर कोण से सिद्ध हुआ कि ये हमले पाक और उसके यहां शरण पाए आतंकी गिरोहों के इशारों पर हुए। इस संबंध में भारत द्वारा हरसंभव साक्ष्य जुटाकर उन्हें अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र और दूसरी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को सौंपा गया और उनसे कहा जाता रहा कि विश्व में व्याप्त आतंक का जनक पाकिस्तान है, परन्तु तब हमारी विदेश नीति व कूटनीति में वो धार नहीं थी, जिसके दम पर हम अपनी बात मनवा सकते थे। फिर आतंक के केन्द्रीय विचार के रूप में पसरी इस्लामिक थ्योरी पर आतंक पीडि़त भारत की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ही जब ये कहती रही कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता, तो सात समुंदर पार अमेरिका और उसके इशारे पर संचालित संयुक्त राष्ट्र में बैठे भारतीय कांग्रेस के अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक प्रतिनिधियों को क्या पड़ी थी कि वो आतंक के केन्द्रीय विचार का सच सामने रख भारत के पक्ष का समर्थन कर उसे आतंक के विरुद्ध लडऩे में मदद करते। इसलिए नब्बे के दशक से लेकर 2016 में ओबामा के कार्यकाल तक अमेरिका पाक प्रायोजित और वैश्विक आतंक के संबंध में आतंक के संरक्षक इस्लामी देशों की झूठी थ्योरी पर चलता रहा। जब सितम्बर, 2001 में अमेरिकी वल्र्ड ट्रेड टॉवर को आतंकियों ने उड़ाया तो अमेरिका की नींद टूटी। अमेरिका ही क्यों, विश्व बिरादरी की नींद उचटी और आतंक के संदर्भ को भारतीय जांच एजेंसियों (तत्कालीन कांग्रेसी सरकार नहीं) के नजरिये से देखने की कोशिश शुरू हुई। उसी कड़ी को अब ट्रंप-मोदी की मित्रता मजबूती से पकड़े हुए है और वे आतंक के समूल नाश के लिए अनेक स्तरीय कार्ययोजनाओं का सफल क्रियान्वयन करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। विश्व को यह सच स्वीकार करना ही पड़ेगा कि मोदी और ट्रंप जैसे नेताओं के उभरने के बाद ही आतंक का केन्द्रीय विचार चर्चा का विषय बना और इस आधार पर आतंक को कुचलने की वैश्विक नीतियां बननी शुरू हुईं अन्यथा जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे विकसित यूरोपीय व संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के सदस्य देश तो इस्लामिक आतंक से प्रत्यक्ष पीडि़त होने के बाद भी आतंक के संबंध में पुराना राग अलापते रहे कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता। आतंक के विनाश के उद्देश्य से 2017 के दिसम्बर में ट्रंप सरकार ने भारत और अमेरिकी संबंधों को सुदृढ़ करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया। तब अमेरिका ने अपनी बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की घोषणा की थी। सुरक्षा नीति के प्रमुख बिंदुओं में वैश्विक आतंक पर नियंत्रण व पूर्ण प्रतिबंध का संकल्प तो था ही, साथ ही आतंक को गोपनीय तरीके से सहायता देने वाले पाकिस्तान, ईरान, यमन आदि देशों के प्रति भी एक स्पष्ट चिंतन व कार्ययोजना थी। इसी नीति के आधार पर जनवरी 2018 में ट्रंप द्वारा पाक पर ऐतिहासिक प्रतिबंध लगाया गया। तब अपने ट्वीट में ट्रंप ने स्पष्ट किया था कि पाकिस्तान 15 वर्षों से अमेरिकी आर्थिक मदद का इस्तेमाल आतंकवाद के पालन-पोषण में कर रहा है, वह एक कपटी देश है और अब तक उसे मदद देती रही अमेरिकी डेमोक्रेट सरकारें भी मूढ़ थीं। वस्तुत: दिसम्बर, 2017 के आखिर में अफगानिस्तान में नाटो सेना में शामिल एक अमेरिकी सैनिक आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गया था। इससे ट्रंप बौखला उठे और उन्होंने पाक को दी जाने वाली 25.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर की सहायता रोकने की धमकी दी। बाद में पाक की काफी मदद रोकी भी गई। यहां से पाक के दुर्दिन शुरू हो गए। हालांकि इसके बाद पाक अपने यहां के आतंकी गिरोहों की धरपकड़ में जुट गया और अमेरिकी मदद बहाल करने की गरज से उसने अमेरिका को संतुष्ट करने के लिए कई आतंकियों को पकडऩे और मारने के साक्ष्य प्रस्तुत किए, लेकिन 2018 के जून में पहले सीरिया और फिर दिसम्बर में अफगानिस्तान से अमेरिका ने अपने आधे सैनिक वापस बुला लिए। ट्रंप को लगने लगा कि अमेरिकी डेमोक्रेट सांसदों की संस्तुति से पुरानी डेमोक्रेट सरकारों के अलग-अलग कार्यकाल में स्वार्थ सिद्धि के लिए पाक को दी जाने वाली अमेरिकी मदद को पूरी तरह रोकना असंभव है, इसलिए उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया। वे अफगानिस्तान और पाकिस्तान स्थित तालिबान सहित अनेक आतंकी गुटों के खात्मे के लिए नाटो सैन्य अभियान में अमेरिकी ऊर्जा नष्ट करने के पक्ष में नहीं थे और इस वर्ष उन्होंने अफगानिस्तान से अपनी पूरी सेना वापस बुलाने का निर्णय ले लिया। अफगानिस्तान में तालिबान हो या पाकिस्तान में अलकायदा, जैश, हक्कानी जैसे आतंकी गिरोह, ये सभी इन देशों के सत्ता के समानांतर चलने वाले एक संस्थागत तंत्र में बदल चुके हैं, जिनसे मुस्लिम धर्म के अनेक अनुयायी जुड़े हुए हैं। ये लोग आतंकी गिरोहों का विरोध करने को राजी नहीं हैं। इतना ही नहीं, ईरान जैसे मुस्लिम देशों में भी सत्ताओं के समानांतर चलने वाले व मुख्यधारा की सत्ता में अनेक स्तरीय हस्तक्षेप रखने वाले आतंकी गिरोहों के तंत्र इन देशों की अधिसंख्य जनता द्वारा सर्वस्वीकार्य हो चुके हैं। सबसे बड़ी बात, इस्लामिक थ्योरी में मुसलमान शिया व सुन्नी धड़ों में बँट एक-दूसरे के रक्त पिपासु बने हुए हैं। इन दो धड़ों के बीच ही आतंक की नौटंकियां चल रही हैं, जिसका प्रमाण सऊदी अरब के तेल कुओं पर ईरान समर्थित यमन स्थित हूती विद्रोहियों द्वारा किए गए हमले हैं। ऐसे में आतंक को शिया व सुन्नी धड़ों से अलग एकाकार के रूप में पहचान कर उस पर वैश्विक कार्रवाई करना तब तक अत्यंत दुष्कर कार्य होगा, जब तक अरब व खाड़ी देशों पर गैर-मुस्लिम देश तेल व गैस के लिए निर्भर रहेंगे। इसी विचार से मोदी ने टेक्सास प्रांत के ह्यूस्टन में लिक्विड नेचुरल गैस (एलएनजी) निर्माता अमेरिकी कंपनियों के सीईओ से भेंट की। यदि शांतिप्रिय गैर-मुस्लिम देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए मध्य-एशिया के खाड़ी देशों पर अपनी निर्भरता पूरी तरह खत्म करते हैं, तो आतंक का वैश्विक तंत्र निश्चित रूप में रीढ़विहीन हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक महासभा में उपस्थित होने के क्रम में ह्यूस्टन में हाउडी मोदी नामक कार्यक्रम से शुरू मोदी की इस सीजन की अमेरिकी यात्रा निश्चित रूप में भारत-अमेरिका मित्रता का एक नया अध्याय लिखेगी, परन्तु इसकी पहली शर्त ये है कि 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप का रिपब्लिकन राजनीतिक दल बहुमत से विजयी होकर पुन: सत्तारूढ़ हो।
आज भारत अमेरिका के सम्मिलित प्रयासों से अमेरिका द्वारा छेड़ा गया व्यापार युद्ध मद्धिम पड़ चुका है। अमेरिकी यात्रा में भारत-अमेरिका के बीच होने वाले उत्साहवर्द्धक परस्पर रक्षा, ऊर्जा और व्यापारिक समझौते इसका प्रमाण हैं। हाल ही में अमेरिका ने चीन के 200 उत्पादों पर लगा अतिरिक्त शुल्क हटा दिया है। ट्रंप ने भारत के साथ शुरू हुई आंशिक व्यापारिक स्पर्धा खत्म करने के संकेत भी दिए हैं। अमेरिका द्वारा भारत को पुन: व्यापार में वरीयता (जनरल सिस्टम ऑफ प्रिफरेंसेज माने जीएसपी) दिए जाने के संकेत मिलने लगे हैं। इन स्थितियों को देख-समझ कोई भी अनुमान लगा सकता है कि __ भारत और अमेरिका के संबंध वास्तव में मधुर हो रहे हैं।