सात्विक प्रवृत्ति का अर्थ अंतर्मुखी होना नहीं
   Date05-Nov-2019

गी ता के बारे में महापुरुषों ने भी अपने स्तर से ही ज्ञान, भक्ति, कर्म, समर्पण, द्वैत, अद्वैत आदि मतों को केन्द्रबिन्दु मानकर उसकी व्याख्या लिखी है, किन्तु इन सारी व्याख्याओं का केन्द्रबिन्दु मानव मन को पूरी तरह अंतर्मुखी बनाना रहा है। लोकमान्य पंडित गंगाधर तिलक की टीका ने तो कर्मयोग को केन्द्रबिन्दु माना है, किन्तु इसकी शाीयता की गहराई के कारण मेरे जैसे सामान्य अध्येता या साधक के भटक जाने की पूरी संभावना बनी रहती है- जिससे उसका व्यावहारिक, लौकिक पक्ष ओझल हो जाता है। मुझे एक गहरी अंतव्र्यथा है कि हमारे शाों में जीवन का इतनी समग्रता में समाधान किए जाने के बावजूद आज हिन्दू समाज इतना अपमानित व कमजोर क्यों है? हम क्यों जात-पाँत, छुआछूत, शोषण सामाजिक विषमता आदि व्याधियों से ग्रस्त हैं? क्या यह इसलिए नहीं हो सका है कि गीता आदि ग्रंथों की व्याख्या का केन्द्रबिन्दु मात्र हमको अंतर्मुखी बनाकर हमारी विकृतियों (काम, क्रोध, मद, लोभ, अहंकार) को दूर करने का रहा है? यह महत्व का है, किन्तु समाज में व्याप्त विषमता, शोषण, नारी अत्याचार को समाप्त करने के लिए शौर्य और पराक्रम का भाव क्षीण-सा क्यों हो गया है? क्या यह मात्र अवतार ग्रहण करने वाले परमात्मा पर ही छोड़ दिया गया है? इस सबके बावजूद इन टीकाओं को पढऩे से मेरे मन की व्यथा का समाधान नहीं मिल सका। क्या इसका कारण कदाचित इसके केन्द्रबिन्दु को पूरी तरह अंतर्मुखी बनाना रहा है? लोकमान्य तिलक की टीका, जैसे अपवाद छोड़ दिए जाएं तो अधिकतर टीकाओं का स्वर अंतर्मुखी है। श्री गीताजी की टीकाओं का केन्द्रबिन्दु अगर मात्र अंतर्मुखी न होकर बहिर्मुखी भी होता तो क्या मानवता आज इतनी अधिक दु:खी होती, भारतीय समाज इतना असंगठित होता? घटनाओं का विश्लेषण महत्व का है। मात्र गीता के उपदेश का विश्लेषण कदाचित उचित केन्द्रबिन्दु पर पहुँचने में सहायक हो सकेगा क्या? न्यूटन, डार्विन, आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिकों के द्वारा बाहर की घटनाओं का गहराई से विश्लेषण किए जाने के कारण ही भौतिक अनुसंधान हुआ है।