आत्मघाती कदम बढ़ाती शिवसेना...
   Date04-Nov-2019

विशेष टिप्पणी
शक्तिसिंह परमार
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई फिलहाल तो देश की राजनीतिक धुरी बन गई है...क्योंकि मुंबई में एकतरफा दबदबा रखने वाली शिवसेना के प्रत्येक कदम, बयान और प्रतिक्रिया पर देश की निगाहें टिकी हैं...महाराष्ट्र की सत्ता के संग्राम का जो जनादेश आया है, उसने जनता की अदालत के संघर्ष को अब राजनीतिक दलों के कार्यालयों तक सीमित कर दिया है...'पल में मासा, पल में तौलाÓ की भांति बदलते समीकरणों ने राजनीतिक गलियारों में 'उहापोहÓ का माहौल बना रखा है...महाराष्ट्र में मुंबई के 'मातोश्रीÓ से लेकर राजधानी नागपुर और दस जनपथ सबके सब मुखर हैं...मौन हैं तो बस मोदी और शाह..! ऐसे में सवाल उठना और जिज्ञासा बढऩा स्वाभाविक है कि क्या शिवसेना शनै: शनै: ही सही, आत्मघाती कदम बढ़ा रही है..? क्योंकि महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा-शिवसेना युति का फार्मूला तय नहीं हो पा रहा है...और शिवसेना 50-50 के फार्मूले पर अड़ी हुई है...सरकार बनने/बनाने और भाजपा से इतर शिवसेना के नए कदम बढ़ाने से पूर्व कुछ सवाल-जवाब शिवसेना-भाजपा दोनों से जरूरी हैं...
शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और उनके प्रवक्ता नतीजों के दिन से एक ही बात दोहरा रहे हैं...यही कि भाजपा-शिवसेना के बीच 50-50 का फार्मूला तय हुआ था...यानी समान भागीदारी..! उद्धवजी, समान भागीदारी थी तो बराबर सीटों पर चुनाव क्यों नहीं लड़ा..? 288 में से भाजपा ने 144 पर चुनाव लड़ा...105 जीती, शिवसेना ने 126 पर ताल ठोंकी..,सिर्फ 56 जीती...यही नहीं, सीटों के अलावा भाजपा ने करीब 26 फीसदी, तो शिवसेना ने महज 16 फीसदी वोट हासिल किए हैं...फिर 50-50 का फार्मूला लागू कहां हुआ..? और फिर जिसकी जितनी मेहनत, जैसा प्रदर्शन, वैसी भागीदारी ही संभव है, बिना मेहनत के बराबर हिस्सेदारी की मांग क्या शिवसेना प्रमुख को शोभा देता है..?
उद्धवजी, आपको 2019 के इस विधानसभा चुनाव में 50-50 का फार्मूला याद है..? जो किसके साथ और किस रूप में हुआ, अभी भी गोपनीय है...फिर भी अच्छी बात है..,लेकिन क्या आपको स्व. बालासाहब ठाकरे और स्व. प्रमोद महाजन के बीच 1995 में हुए उस फार्मूले का ध्यान है, जिसमें शिवसेना ने 171 सीटों पर और भाजपा ने 117 सीटों पर चुनाव लड़ा...बड़े दल के रूप में शिवसेना को मुख्यमंत्री पद (मनोहर जोशी) और भाजपा को उपमुख्यमंत्री पद मिला था...क्या आज उसके उलट स्थिति नहीं है..? फिर आप क्या बालासाहब के नीतिगत पदचिन्हों से विपरीत चलने को तैयार हैं..?
उद्धवजी, 2014 में भाजपा-शिवसेना ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था...इसके बावजूद आपको गठबंधन साथी के रूप में भाजपा ने सरकार में जवाबदेही सौंपी..,लेकिन 5 साल आपके मुखारविंद से लगातार केंद्र और राज्य सरकार के लिए आलोचना ही झरती रही...वह भी हद दर्जे की...क्या यही होता है गठबंधन धर्म..? अगर आपको जनता पर इतना ही विश्वास था तो 2019 में सभी सीटों पर अकेले चुनाव क्यों नहीं लड़ा..?
उद्धवजी, शिवसेना ने भाजपा से इस बार गठबंधन ही इसलिए किया ताकि मोदी सरकार की लोकप्रियता और कार्यों की सवारी करके आप अपनी सीटें बढ़ा सकें...क्या भाजपा के साथ गठबंधन करके आपको वोटों और सीटों का प्रत्यक्ष लाभ नहीं हुआ है..? इसके एवज में अब मोलभाव पर उतर आना और दूसरे नंबर के दल होने के बाद भी एक नंबर के पद के लिए दावेदारी करना क्या न्यायोचित है..? क्या यह उन मतदाताओं के साथ छलावा नहीं है, जिन्होंने आपको भाजपा के साथ खड़े होने की एवज में वोट ही नहीं, विधानसभा सीटें भी सौंपी हैं..?
उद्धवजी, सप्ताहभर की बयानबाजी के बीच शिवसेना का जो रुख भाजपा से नाता तोड़कर नए गठबंधन साथी बनाने के संकेत कर रहा है..? क्या वे आपकी नीतिगत विचारधारा से कभी मेल खाते थे..? या भविष्य में खाएंगे..? क्या शरद पवार के राकांपा और कांग्रेस के साथ आप 5 साल सरकार चला लेंगे..? या दोनों ही दल आपको सरकार चला लेने देंगे..? जिस कांग्रेस-राकांपा का हाथ पकड़कर शिवसेना सत्ता के सपने संजो रही है..? उनका चरित्र ही भाइयों में विषवमन करके राजनीतिक स्वार्थ की रोटी सेंकना रहा है...और बाद में वे क्या नीति अपनाते हैं, सबको मालूम है...देवीलाल से लेकर अन्य तक का इतिहास गवाह है...
उद्धवजी, शिवसेना की जो राह आप बयानों और प्रतिक्रियाओं के जरिए तय करने के संकेत दे रहे हैं..,क्या वह स्व. बालासाहब ठाकरे की जीवनभर की जमापूंजी के उस विचार के खिलाफ नहीं है, जिन्होंने कांग्रेस-राकांपा के विचारों-गड़बडिय़ों और नीतिगत रूप से स्खलित कार्यों के विरोध में स्वयं को खड़ा करके शिवसेना को उस मुकाम तक पहुंचाया था, जहां से उसने न केवल सत्ता संचालन..,बल्कि जनमत तैयार करने में भी महती भूमिका का निर्वाह किया...ऐसे में दशकों से शिवसेना-भाजपा की जो युति चली आ रही है, उसे थोड़े और क्षणिक राजनीतिक स्वार्थ के लिए अवसरवाद की ढाल बनाकर बिसार देने में आपको भविष्य में क्या और कितना हासिल होगा..? आज ही विचार करना जरूरी है...
आज महाराष्ट्र का विवाद भाजपा द्वारा पहले तैयार की गई जमीन का ही नतीजा है...गोवा, मणिपुर में भाजपा को कहां बहुमत मिला था...दूसरे नंबर की पार्टी होने के बाद भी सत्ता संचालन कर रही है...उसी राह पर चलकर कांग्रेस ने कर्नाटक में तीसरे नंबर पर रही जदएस के कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बना दिया था...फिर कर्नाटक में जोड़-तोड़ का खेल चला, उससे कौन अनभिज्ञ है..? 2014 के पूर्व उत्तराखंड में तो भाजपा ने उस समय किरकिरी करवा ली थी, जब न्यायालय ने कांग्रेस सरकार को बहाल किया था...बिहार में तो नीतीश कुमार बड़े भाई की भूमिका पर ही अड़े रहते हैं...और उसे भाजपा मानने को मजबूर भी है...कहने का तात्पर्य यही है कि समय और परिस्थितियों के मान से जब भाजपा ने ही सत्ता प्राप्ति के कोई अवसर नहीं गंवाए, तब किस मुंह से शिवसेना को नसीहत दी जा सकती है...मौका देखकर वार कर 'मीरÓ साबित होने की इस राजनीतिक परिपाटी से ही लोकतांत्रिक माहौल अनेक बार गंदला होता नजर आता है...जिसका दुष्प्रभाव यही होता है कि कर्नाटक से लेकर महाराष्ट्र तक भले ही भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी हो..,लेकिन अवसरवादी लोग उस जनता द्वारा दिए गए जनादेश का मखौल उड़ाकर स्वार्थ की रोटी सेंक ही लेते हैं...इसी अवसरवादिता को लगाम लगाने की पहल भी भाजपा को अपने कंधों पर लेना होगी...क्योंकि शुचिता की सिर्फ बातों से काम नहीं चलेगा...उस पर अमल होता भी दिखना चाहिए...
शिवसेना तथाकथित 50-50 के फार्मूले को लेकर अड़ी हुई है तो क्या उसकी व्यक्तिगत जवाबदेही नहीं थी कि वह चुनाव प्रचार के दौरान सार्वजनिक घोषणा करती कि मुख्यमंत्री पद हमारा होगा...अब अवसरवाद की सवारी कहीं शिवसेना को कुछ ज्यादा ही महंगी न पड़ जाए..? क्योंकि जिस राह पर शिवसेना कदम बढ़ा रही है...वहां पर आत्मघात के सिवाय उसे कुछ हासिल होने वाला नहीं है... श्चड्डह्म्द्वड्डह्म्ह्यद्धड्डद्मह्लद्ब८०ञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व