जीएसटी संग्रह की राह में रुकावट...
   Date04-Nov-2019

माल एवं सेवा कर (जीएसटी) को देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने एवं आर्थिक पक्षों में पूर्ण पारदर्शिता के साथ ही नियमित रूप से प्रत्येक पक्ष द्वारा समय पर कर अदायगी के उस रूप में देखा गया था, जिसके लिए 'एक देश-एक करÓ व्यवस्था की दशकों से मांग लंबित थी...सही मायने में 2017 में जीएसटी को लागू करने के साथ देश में कर एकीकरण का सूर्योदय हुआ था...लेकिन जो नीतिगत व्यवस्था है या फिर व्यापार-व्यवसाय के मान से जो व्यवहारिक समस्याएं हैं...उन्हीं को जीएसटी संग्रह की राह में रुकावट के रूप में देखा गया...यही नहीं, सरकार ने भी इस बात को समय रहते माना..,तभी तो जीएसटी को जिस रूप में दो साल पूर्व लागू किया गया था, वह स्वरूप अब लगातार जीएसटी में तोडफ़ोड़ व लगातार रद्दोबदल के बीच कितना बदल गया है...हर किसी को मालूम है...जीएसटी की जिस रूप में पहचान बनी थी और जिस मकसद से उसे लागू किया गया था, उसमें कहीं-न-कहीं पलीता लगाने में हमारी नीतिगत वह व्यवस्थाएं भी हैं और साथ ही आम आदमी फिर चाहे वह उद्योग, व्यापार-व्यवसाय से जुड़ा हो...और उसकी मानसिकता आज भी कहीं-न-कहीं करों को छुपाने अथवा अपने निजहित के लिए राष्ट्रीय खजाना को क्षति पहुंचाने की रही है...इसी मानसिकता ने जीएसटी को सफलता दिलाने के बजाय उसकी राह में व्यवहारिक रूप से लोगों द्वारा जबरिया बयां की गई पीड़ाओं को ही एक रोड़े के रूप में खड़ा कर दिया है...मौजूदा वित्तीय वर्ष के अक्टूबर में जीएसटी संग्रह 5.29 प्रतिशत घटकर कुल 95 हजार 380 करोड़ रु. रहा है...जिसमें 17 हजार 582 करोड़ रु. का (केंद्रीय) सीजीएसटी और 23 हजार 674 करोड़ रु. का (राज्य) एसजीएसटी शामिल है...अक्टूबर 2019 में 86 हजार 517 करोड़ रु. का (एकीकृत) आईजीएसटी दर्ज किया गया है...जिसमें आयात प्राप्त 21 हजार 446 करोड़ रु. भी शामिल है...7,607 करोड़ रु. का उपकर या शेष रहा है, जिसमें आयात से प्राप्त 774 करोड़ रु. शामिल है...कुल मिलाकर सितम्बर माह के लिए 31 अक्टूबर 2019 तक 73.83 लाख जीएसटीआर 3-बी रिटर्न दाखिल किए गए...यानी अक्टूबर 2018 में संग्रहित जीएसटी की तुलना में अक्टूबर 2019 में 5.29 कम रहा...ऐसे में लगातार जीएसटी में किए जा रहे बदलावों पर और परिवर्तन की टेढ़ी नजर पडऩा तय है...वैसे भी सरकार ने एक समिति बना दी है, जो जीएसटी में आमूलचूल परिवर्तन के साथ नए स्वरूप में उसे प्रस्तुत करने वाली है...इससे हमारी कर व्यवस्था जो कि कर एकीकरण के रूप में विख्यात होने वाली थी, उसको कहीं-न-कहीं धक्का जरूर लगा है...अगर इस जीएसटी संग्रह में कमी को असर के रूप में देखें तो केंद्र की सरकार की आमदनी का जरिया यह कर संग्रह ही है...इसमें कमी का मतलब लोग कम पैसा खर्चा कर रहे हैं, इसे आर्थिक सुस्ती की वजह भी माना जा सकता है और व्यक्तिगत खर्च में कटौती के रूप में भी देखा जा सकता है...जब कर वसूली बेहतर होती है, तब ही सरकार रियायत देने की स्थिति में होती है... कर संग्रह ज्यादा होने पर शिक्षा व अन्य मूलभूत सुविधाओं पर सरकार अधिक खर्च कर पाती है...अब जीएसटी संग्रह में लगातार कमी मतलब सरकार के हाथों से खर्च में कमी का अंदेशा और बढ़ जाएगा...यही नहीं, कर वसूली बढ़ाने के लिए सरकार अन्य मदों पर जीएसटी लगाना का विचार कर सकती है...अनाज व अन्य पक्षों को भी जीएसटी के दायरे में लाने पर विचार हो सकता है...व्यक्तिगत आयकर की दरों में राहत की फिलहाल उम्मीद नहीं रहेगी...यही नहीं, जिन वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी कौंसिल ने राहत दी थी या दरें कम की थी, उनमें फिर संशोधन की स्थितियां बनेंगी...क्योंकि जीएसटी संग्रह में लगातार कमी यह तीसरा महीना है...जिसका असर लंबा दिख सकता है...
दृष्टिकोण
मध्यप्रदेश की अलग पहचान...
देश का हृदय प्रदेश कहलाने वाला मध्यप्रदेश विचारों, कार्यों, संसाधनों और ऐतिहासिक, पुरातत्विक एवं सांस्कृतिक से लेकर भौगोलिक व खनिज संपदा के मान से भी हर किसी के हृदय में बसने वाला प्रदेश है...क्योंकि यहां की खदानों में हीरा पाया जाता है...जंगलों का राजा टाइगर भी मध्यप्रदेश की शान बढ़ाता है...मध्यप्रदेश की स्थापना 1 नवम्बर 1956 को हुई थी...शुक्रवार को प्रदेशभर में मध्यप्रदेश स्थापना दिवस पर अनेक तरह के रंगारंग व सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ मध्यप्रदेश को नंबर वन राज्य बनाने के लिए संकल्प के साथ ही कार्यक्रमों की होड़ रही...मुख्यमंत्री कमल नाथ ने जहां स्थापना दिवस पर भोपाल में मंत्रालय में आयोजित कार्यक्रम में अधिकारियों-कर्मचारियों से म.प्र. की अलग पहचान के लिए नजरिया व सोच में परिवर्तन लाने का आव्हान किया...वहीं प्रभारी मंत्रियों व अन्य मंत्रियों ने जिलों में विभिन्न कार्यक्रमों, सम्मान समारोह के साथ ही मुख्यमंत्री के संबोधन का वाचन किया और मध्यप्रदेश को सर्वांगीण रूप से विकसित राज्य बनाने में सभी की सहभागिता पर जोर दिया...इसमें कोई दो राय नहीं है कि मध्यप्रदेश की गत 15 वर्षों में बीमारू राज्य से विकासशील राज्य के रूप मेें पहचान बन चुकी है...अब विकास की रफ्तार पकड़ चुके मप्र को बेहतर मार्गदर्शन के साथ ही कर्मचारियों, अधिकारियों एवं जनता के उस सामूहिक सहयोग की जरूरत है, जिसके लिए वह अपनी संभावनाओं के अनुरूप अलग पहचान बनाने में सफल हो सकता है...