अवैध घुसपैठियों को खदेडऩा समय की आवश्यकता
   Date04-Nov-2019

मनमोहन शर्मा
गृ ह मंत्री अमित शाह ने यह घोषणा की है कि अगले पांच सालों में एक-एक विदेशी घुसपैठिये को चुन-चुनकर देश से निष्कासित कर दिया जाएगा। विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि यह मुद्दा जानबूझकर भाजपा हिन्दू मतों के ध्रुवीकरण के लिए उछाल रही है। इसलिए अधिकांश गैर-भाजपाई शासित राज्य सरकारों ने इसे लागू करने से साफ इनकार कर दिया है। जहां तक मुस्लिम दलों का सम्बन्ध है, वे खुलेआम इसका विरोध कर रहे हैं। अगर अभी तक के घटनाक्रम का विश्लेषण किया जाए तो उससे यह साफ होता है कि देश के कोने-कोने में फैले हुए घुसपैठियों का पता लगाना और उन्हें निष्कासित करना टेढ़ी खीर है।
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि इस देश में करोड़ों की संख्या में विदेशी घुसपैठिये मौजूद हैं। वे दशकों से इस देश में डेरे डाले हुए हैं और उनमें से अधिकांश के पास उनके भारतीय नागरिक होने के पहचान पत्र भी मौजूद हैं। ऐसी स्थिति में इन घुसपैठियों की पहचान करना और उन्हें देश से निष्कासित करना आसान नहीं है। जहां तक भाजपा या उसके पुराने अवतार जनसंघ का सम्बन्ध है, वह शुरू से ही विदेशी घुसपैठियों के मुद्दे को उछालते आ रहे हैं, मगर इसके बावजूद यह भी सच है कि आज तक भाजपा इन बिना बुलाए मेहमानों को देश से खदेडऩे की दिशा में कोई उल्लेखनीय काम नहीं कर पाई है। उदाहरण के तौर पर असम गण परिषद और असम छात्र परिषद ने कई दशकों तक इन घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने का अभियान चलाया था, मगर जब वह सत्ता में आए तो लम्बे-चौड़े दावे के बावजूद पांच वर्ष में वह केवल पांच हजार संदिग्ध घुसपैठियों को ही चिन्हित कर पाए और उनमें से एक व्यक्ति को भी वे देश से निष्कासित करने में सफल नहीं हुए। क्या यही इतिहास अब भी दोहराया जाएगा?
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस बात की स्पष्ट घोषणा की है कि वह एनआरसी को अपने राज्य में लागू नहीं करेगी, क्योंकि इसकी आड़ में भाजपा समाज को विभाजित करना चाहती है। माक्र्सवादी पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने कोलकाता में माक्र्सवादी पार्टी के अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए भाजपा पर आरोप लगाया कि वह जानबूझकर देश में साम्प्रदायिकता के विष को फैला रहे हैं। उनका लक्ष्य हिन्दू साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहन देकर आने वाले चुनाव में बहुसंख्यक समाज के वोट बटोरना है, इसलिए वह अल्पसंख्यकों को अपना निशाना बनाकर समाज के वातावरण को खराब कर रहे हैं। तेलंगाना और आंध्र सरकार ने भी एनआरसी को लागू करने से इनकार कर दिया है। कांग्रेस हाईकमान ने भी इन प्रयासों की निंदा की है। इत्तेहादुल मुस्लमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने यह आरोप लगाया है कि मोदी सरकार जानबूझकर इस मामले को उछालकर देश में हिन्दू राष्ट्र के पुराने मुद्दे को हवा दे रही है। उन्होंने कहा है कि देश के संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार दे रखे हैं। ऐसी स्थिति में किसी विशेष धर्म के मानने वालों को निशाना बनाना संविधान की धज्जियां उड़ाना है, इसलिए हम इसका डटकर विरोध करेंगे। जमीयत उलेमा के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने भी सरकार पर यह आरोप लगाया है कि वह देश में शताब्दियों से रहने वालों के खिलाफ जहरीला वातावरण बना रही है और एनआरसी की आड़ में वह सिर्फ मुसलमानों को अपना निशाना बनाने पर तुली हुई है। सरकारी प्रचार के कारण देश के मुसलमानों में असुरक्षा की भावना पनप रही है, जो कि राष्ट्रहित में नहीं है। मुस्लिम लीग, पीस पार्टी आदि ने भी इस अभियान को देश की एकता के लिए खतरनाक बताया है। दूसरी ओर उत्तरप्रदेश में योगी सरकार ने सभी जिलों में विदेशी घुसपैठियों को चिन्हित करने का अभियान तेज कर दिया है। उत्तरप्रदेश के पुलिस महानिदेशक ओमप्रकाश सिंह ने यह घोषणा की है कि राज्य के कोने-कोने में विदेशी घुसपैठियों का पता लगाने का अभियान जोरों से चलाया जाएगा और इस बात का भी पता लगाया जाएगा कि अगर उनके पास नागरिकता प्रमाण पत्र मौजूद हैं तो वह उनको किसने सप्लाई किए थे। पुलिस उनके खिलाफ भी कठोर कार्रवाई करेगी। महाराष्ट्र और हरियाणा ने भी एनआरसी के अभियान को शुरू करने की घोषणा की है।
यह कड़वा सच है कि मुस्लिम लीग बंगाल के साथ-साथ असम को भी हड़पना चाहती थी। कहा जाता है कि मुगलिस्तान की योजना को कार्यान्वित करने का प्रयास असम के मुस्लिम लीगी मनोवृत्ति के मुख्य सचिव सर अकबर हैदरी ने 1934 से ही शुरू कर दिया था। देश के विभाजन के समय असम के सबसे उपजाऊ क्षेत्र सिलहट को मुस्लिम बहुल होने के कारण पूर्वी पाकिस्तान में मिला दिया गया। देश के विभाजन के बाद भी असम में घुसपैठ का सिलसिला पूरे जोर-शोर से जारी रहा। इस अभियान को फखरुद्दीन अली अहमद और मोईन उल हक चौधरी ने प्रोत्साहन दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि 1911 में संयुक्त असम में मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात पौने तीन प्रतिशत था, जो कि 2011 में बढ़कर 37 प्रतिशत तक पहुंच गया। अवैध-घुसपैठ को कांग्रेसी सरकारों ने वोट बैंक की राजनीति के कारण प्रोत्साहन दिया। जब भी लोगों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई तो कांग्रेसी मुसलमानों ने यह बवेला मचाना शुरू कर दिया कि साम्प्रदायिक ताकतें भारत में शताब्दियों से रहने वाले मुसलमानों को विदेशी नागरिक करार देकर स्वदेश से बाहर खदेडऩा चाहती हैं। पश्चिम बंगाल हो या असम, त्रिपुरा हो या कोई अन्य राज्य, बांग्लादेश से आने वाले इन बिना बुलाए मेहमानों का आने का तांता बराबर लगा रहा। 1971 में जब बांग्लादेश में पाकिस्तान से पृथक होने का अभियान तेज हुआ तो पश्चिमी पाकिस्तान के सैनिकों ने बंगालियों को उत्पीडि़त करने का सुनियोजित अभियान चलाया, जिसमें हजारों बेगुनाह लोग मारे गए। पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों से पीडि़त होकर करोड़ों लोगों को भारत में शरण लेनी पड़ी। इसके बाद घुसपैठिये समूचे भारत में अपने पैर पसारने लगे। आज देश का कोई ऐसा भाग नहीं है, जिसमें ये घुसपैठिये मजबूत न हों। अब तो उनकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी भी भारतीय समाज में इस तरह से घुल-मिल चुकी है कि उनका सुराग लगा पाना बेहद कठिन है। देश में कितने विदेशी घुसपैठिये हैं हालांकि इसके कोई अधिकृत आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी इनकी संख्या दो से तीन करोड़ के बीच बताई जाती है। जहां तक एनआरसी का सम्बन्ध है, असम में इन घुसपैठियों के खिलाफ छात्रों ने जबरदस्त आंदोलन चलाया था, जिसने सारे जनजीवन को ठप्प कर दिया था। 1985 में असम छात्र संघ और राजीव सरकार के बीच समझौता हुआ था, जिसमें 1971 के बाद आने वाले लोगों को चिन्हित करने का निर्णय हुआ था। कांग्रेस सरकार ने 2010 में एनआरसी को अप-टू-डेट करने का काम असम के बारपेटा और कामरूप जिलों में शुरू किया था, जिस पर वहां जबरदस्त दंगे शुरू हुए थे। मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया और सर्वोच्च न्यायालय ने असम सरकार को एनआरसी को अप-टू-डेट करने का निर्देश दिया। 2019 में इस सूची को प्रकाशित किया गया, जिसमें 19 लाख लोगों की नागरिकता को संदिग्ध बताया गया।
सबसे जटिल समस्या यह है कि यदि इन घुसपैठियों की पहचान कर भी ली जाती है तो उन्हें कहां रखा जाएगा। देश की जेलों में पहले ही क्षमता से अधिक कैदी हैं, इसलिए उनको वहां रखना असंभव होगा। हाल ही में असम सरकार ने पचास एकड़ भूमि में संदिग्ध नागरिकता वाले घुसपैठियों को हिरासत में रखने का एक नजरबंदी शिविर बनाया है, जिसके निर्माण पर 230 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। इनमें नजरबंद रखने वाले प्रत्येक नागरिक पर वार्षिक कम-से-कम दस हजार रुपए की धनराशि खर्च करनी होगी। क्या देश की वर्तमान आर्थिक स्थिति में केन्द्र सरकार के लिए करोड़ों घुसपैठियों को रखने के लिए नजरबंदी शिविर बनाना सम्भव होगा? यह ऐसा यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर देना सम्भव नहीं है।