अस्थिर चित्त ही निराशा का कारक
   Date04-Nov-2019

धर्मधारा
ह म अपने मन में, घर में, तन में कचरा भरते रहते हैं, सामान इक_ा करते रहते हैं। घर में यदि देखा जाए तो हम कितना सारा सामान और साथ में कबाड़ इक_ा कर लेते हैं। जरूरत नहीं है, फिर भी इक_ा कर लिया है। हमारे घर में कितना सारा सामान ऐसा है, जिसकी हमें कोई जरूरत नहीं है, लेकिन हम उसे संभालकर रखे हुए हैं कि वह अभी नहीं तो भविष्य में काम आएगा। केवल घर ही नहीं, इसी तरह मन में भी हम कचरा भरते हैं। थोड़ी-सी ईष्र्या, थोड़ा-सा द्वेष, थोड़ी-सी घृणा, थोड़ी-सी आशंका, थोड़े-से संशय, थोड़े-से सवाल भरते रहते हैं। इसी तरह तन में भी हम कुछ भी भरते रहते हैं। कुछ भी खाते-पीते रहते हैं। इस तरह हम मन में, तन में, घर में सब जगह जहर भरते हैं और प्रकृति यह अतिरिक्त बोझ सहन नहीं करती। तन में जब आवश्यकता से अधिक इक_ा हो जाता है और वह शरीर पर अपना विषैला प्रभाव डालता है, तो हम बीमार पड़ जाते हैं; क्योंकि प्रकृति उस विष को शरीर से बाहर निकालने की एक व्यवस्था बनाती है। इसी तरह मन में भी जब आवश्यकता से अधिक कचरा इक_ा हो जाता है, तो मन बीमार हो जाता है। जो हमें स्वप्न आते हैं, 90 प्रतिशत स्वप्न कूड़ा-कचरा होते हैं। आलतू-फालतू के स्वप्न होते हैं; क्योंकि जब रात में हम सो जाते हैं तो मन अपने कबाड़ को स्वप्नों के माध्यम से बाहर निकालता है। व्यक्तित्व परिष्कार के चार चरण हैं-आत्मचिंतन, आत्मनिरीक्षण, आत्मसमीक्षा, आत्मपरिष्कार और भगवान कहते हैं-ततस्ततौ? देखो, कहाँ-कहाँ? क्या-क्या चीजें हैं, जो मन को अस्थिर करती रहती हैं? क्या-क्या चीजें हैं, जिनसे मन रोगी बनता रहता है?