सफलता का सूत्र
   Date30-Nov-2019

प्रेरणादीप
श्रीरामकृष्ण परमहंस शिष्यों को उपदेश दे रहे थे। वे समझा रहे थे कि जीवन में आए अवसरों का महत्व व्यक्ति साहस तथा ज्ञान की कमी के कारण नहीं समझ पाते। समझकर भी उनके पूरे लाभों का ज्ञान न होने से उनमें अपने आप को पूरी शक्ति से लगा नहीं पाते। शिष्यों की समझ में उनकी यह बात ठीक ढंग से न आ सकी। तब श्रीरामकृष्ण देव बोले-'नरेन्द्र! कल्पना कर कि तू एक मक्खी है। सामने एक कटोरे में अमृत भरा रखा है। तुझे यह पता है कि यह अमृत है, बता उसमें एकदम कूद पड़ेगा या किनारे बैठकर उसे स्पर्श करने का प्रयास करेगा।Ó उत्तर मिला-'किनारे बैठकर स्पर्श का प्रयास करूंगा। बीच में एकदम कूद पडऩे से अपने जीवन-अस्तित्व के लिए संकट उपस्थित हो सकता है।Ó साथियों ने नरेन्द्र की विचारशीलता को सराहा, किंतु परमहंसजी हंस पड़े और बोले-'मूर्ख! जिसके स्पर्श से तू अमरता की कल्पना करता है, उसके बीच में कूदकर उसमें स्नान करके सराबोर होकर भी मृत्यु से भयभीत होता है।Ó चाहे भौतिक उन्नति हो या आध्यात्मिक-जब तक आत्मशक्ति का पूर्ण समर्पण नहीं होता, तब तक सफलता नहीं मिलती।