राजनीतिक संगठनों की कुठपुतली बनते छात्र
   Date30-Nov-2019

आशीष वशिष्ठ
देशभर में किसी ना किसी मुद्दे पर विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन चल रहे हैं। जेएनयू हो या बीएचयू, सब जगह पढ़ाई पर इसका बुरा असर पड़ रहा है। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में चुनावी सरगर्मियां और उनसे उपजे विवाद चर्चा का विषय रहे। उत्तरप्रदेश में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय भी अकसर पठन-पाठन के लिए कम, विवादों के लिए ज्यादा जाना जाता है। यह तो बात है उत्तर भारत के कुछ नामचीन विश्वविद्यालयों की, जबकि हालात ये हैं कि ज्यादातर विश्वविद्यालयों में स्थितियां ऐसी ही हैं, या फिर इससे भी बदतर।
देश में सरकारी और निजी मिलाकर सैकड़ों विश्वविद्यालयों में से कुछ अपनी गुणवत्ता के लिए विख्यात हैं तो कुछ अपनी अराजक व्यवस्था के लिए। इन दिनों जेएनयू और बीएचयू चर्चा में हैं। जेएनयू के छात्र फीस वृद्धि के मामले में सड़कों पर उतरे हैं तो वहीं बीएचयू के छात्र संस्कृति संकाय में एक मुस्लिम प्रोफेसर की नियुक्ति से नाराज हैं। उत्तराखंड में आयुर्वेद की पढ़ाई कर रहे सैकड़ों छात्र बेतहाशा फीस वृद्धि के खिलाफ पिछले 48 दिनों से धरने पर हैं। शिक्षा के मंदिरों में उपजी अशांति शिक्षा व्यवस्था की पोल तो खोलती ही है, वहीं व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न भी खड़े करती है। ऐसे में प्रश्न यह भी है कि आखिरकार हमारे शिक्षा के मंदिर इतने अशांत क्यों हैं? क्यों हर बीतते दिन के साथ उनमें पढ़ाई कम और राजनीति हावी होती जा रही है? क्यों छात्र छोटे-बड़े मुद्दों को लेकर आंदोलन के लिए विवश हो रहे हैं? क्या विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों के अहित में निर्णय ले रहे हैं? क्या छात्र जानबूझकर तिल का ताड़ बना रहे हैं? क्या छात्र शिक्षकों या विश्वविद्यालय प्रशासन की राजनीति के मोहरे तो नहीं बन रहे हैं? क्या छात्रों के कंधें पर बंदूक रखकर कोई दूसरा तो गोली नहीं चला रहा है? बात या कारण चाहे जो भी हो, इसमें अधिकतम हानि छात्रों की होनी तय है। हमारे विश्वविद्यालयों ने समय-समय पर देश को नई दिशा दिखाने का काम किया है। स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता के बाद भारत में जितने भी परिवर्तनकारी सामाजिक आंदोलन हुए उनमें छात्रों की भूमिका बहुत अहम रही है। छात्रों ने कालांतर में प्रजातांत्रिक व अहिंसक तरीके से अपनी मांगों के समक्ष व्यवस्था को झुकाने का काम किया है, लेकिन आज जिस तरह की हिंसक और उदण्डता से परिपूर्ण आचरण हमारे छात्र अपनी मांगें मनवाने के लिए कर रहे हैं, वो सोचने को मजबूर करता है। छात्रों के बदलते व्यवहार के पीछे विश्वविद्यालय प्रशासन की अक्षमता, असंवेदनशीलता और राजनीति भी एक बड़ी वजह है। छात्र कहीं न कहीं व्यवस्था का शिकार दिखाई देते हैं। वहीं चंद छात्र और छात्र संगठन अपने निजी स्वार्थों व लक्ष्यों की पूर्ति के लिए शिक्षा के मंदिरों का वातावरण दूषित करने से बाज नहीं आते हैं। पिछले साल गोरखपुर विश्वविद्यालय में एक दलित शोध छात्र ने इसलिए आत्महत्या की कोशिश की क्योंकि उसके विभागाध्यक्ष और गाइड कथित तौर पर जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करके उसे मानसिक तौर पर प्रताडि़त करते थे। जानकारों का कहना है कि विश्वविद्यालयों में बढ़ रही इस अराजकता और अनुशासनहीनता के लिए सिर्फ छात्र या अध्यापक या फिर कुछेक लोग ही नहीं, बल्कि पूरा तंत्र दोषी है। वास्तव में सरकार के एजेंडे में शिक्षा और विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता प्रमुख होनी चाहिए, लेकिन ऐसा दिखता नहीं है। विश्वविद्यालयों में कुलपतियों के खिलाफ छात्रों में आक्रोश बढ़ता दिख रहा है। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति पहले कभी नहीं थी, लेकिन जिन वजहों से संस्था के इन शीर्ष अधिकारियों पर उंगलियां उठ रही हैं, वे जरूर हैरान करने वाली हैं। पिछले साल इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वीसी प्रोफेसर रतनलाल हांगलू चर्चाओं में बने थे। असल में प्रोफेसर रतनलाल हांगलू की एक महिला के साथ कथित तौर पर कुछ आपत्तिजनक बातचीत वायरल होने और फिर इन खबरों के मीडिया में आने के बाद छात्र सड़कों पर उतर आए थे। बीते वर्ष वाराणसी के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय यानी बीएचयू में मामूली विवाद को लेकर छात्रों में झड़प हुई जो कुछ देर में हिंसा, आगजनी, तोडफ़ोड़ और फिर धरना-प्रदर्शन में तब्दील हो गई थी। जेएनयू का गौरवशाली इतिहास रहा है। देश-विदेश में तमाम प्रतिष्ठित व्यक्तित्व जेएनयू के कैम्पस में गढ़े गए हैं। अभी हाल में अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त अभिजीत बैनर्जी भी इसी विश्वविद्यालय की उपज हैं। सीपीएम नेता सीताराम येचुरी के अलावा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी यहां के छात्र रहे हैं। इनके अलावा देश के तमाम नामी पत्रकार, लेखक और दूसरी हस्तियां भी जेएनयू से पढ़कर निकलीं लेकिन इसकी चर्चा केवल उक्त कारणों से न होकर उसकी वामपंथी वैचारिक पहचान के साथ ही परिसर के भीतर की जीवनशैली और सार्वजनिक आचरण को लेकर ज्यादा है। लंबे समय तक इसमें वामपंथी रूझान वाले छात्र संगठनों का आधिपत्य रहा, लेकिन पिछले कई वर्षों से केंद्रीय विश्वविद्यालय जेएनयू कई दूसरे कारणों से सुर्खियों में बना हुआ है। देश विरोधी नारे लगाने से लेकर शहीद सैनिकों का अपमान एक जेएनयू के कैम्पस में हो चुका है। बात केवल वामपंथ के प्रचार-प्रसार की रहती तब भी ठीक था, किंतु जब अफजल गुरु की फांसी का विरोध होने के साथ कश्मीर की आजादी और भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे गूंजने लगे तब जेएनयू को लेकर चिंता का माहौल देश भर में बना। कन्हैया कुमार को लेकर हुआ विवाद सर्वविदित है। बहरहाल जेएनयू को लेकर चल रहे मौजूदा विवाद का कारण छात्रावास की फीस के साथ दूसरे शुल्क बढ़ाए जाने के अलावा कुछ प्रतिबंध लगाया जाना है। जिनकी वजह से छात्र-छात्राओं की उन्मुक्तता पर रोक लगने का रास्ता खुल जाता। छात्रों ने शुल्क में भारी-भरकम वृद्धि को लेकर हंगामा मचाया। ये तर्क भी दिया जा रहा है कि संस्थान में पढऩे वाले तकरीबन 40 फीसदी विद्यार्थी बेहद गरीब परिवारों के हैं जो अपनी बौद्धिक प्रतिभा के बल पर इस विश्वविद्यालय में प्रवेश पा सके। शुल्क में वृद्धि के कारण वे खर्च नहीं उठा सकेंगे। इसके बाद बात देश भर में शिक्षा को सस्ती किए जाने की उठ खड़ी हुई। बाकी शिक्षण संस्थानों में भी शुल्क का ढांचा जेएनयू जैसा किए जाने की मांग भी उठने लगी लेकिन पता चला है कि सस्ती शिक्षा का लाभ लेते हुए अनेक ऐसे छात्र भी इस संस्थान में मौजूद हैं, जिनकी आयु 35 और 40 वर्ष से भी ज्यादा हो चुकी है। शोधार्थी के रूप में वे वहां समय बिता रहे हैं। वहां की स्वछंदता को आजादी के नाम पर संरक्षण देने का प्रयास भी चला करता है। एक शैक्षणिक संस्थान में हिन्दुओं के आराध्य देवी-देवताओं का अपमान खुलेआम होता रहे और विरोध करने पर बवाल हो तो उसे वैचारिक स्वतंत्रता के नाम पर उचित कहना भी अनुचित है। सरेआम छात्र-छात्राएं चुम्बन करते हुए अपनी आजादी का प्रदर्शन करें ये किसी शैक्षणिक संस्थान में किस तरह सही है, ये एक बड़ा सवाल है। जेएनयू में पढऩे वालों के लिए कोई समय-सीमा क्यों नहीं है, ये भी बड़ा सवाल है। इस परिसर में वामपंथी सोच का प्रभाव भले रहे, लेकिन स्वामी विवेकानंद की मूर्ति का अपमान किए जाने का दुस्साहस करने वालों को भी उनके किए का दंड मिलना चाहिए। जेएनयू के छात्र संगठन यदि शिक्षा को सस्ती किए जाने को लेकर देशव्यापी मुहिम छेड़ते तब शायद उन्हें सभी का समर्थन मिल सकता था। जो लोग छात्रों के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं उन्हें उनकी उदण्डता की निंदा भी करनी चाहिए। जानकारों के मुताबिक जब तक विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप, दिलचस्पी और भ्रष्टाचार का बोलबाला रहेगा, उनके कार्यों में ईमानदारी की कल्पना करना बेमानी होगा। हालांकि कुछ लोग विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति और छात्र संघ होने को भी इस तरह के विवादों से जोड़ते हैं, लेकिन छात्र संघों के इतिहास और छात्र हित में उनकी अनिवार्यता को इंगित करते हुए ऐसे तर्कों का खंडन करने वालों की भी कमी नहीं है। बदलते वक्त ने छात्रों की राजनीति और आंदोलन के स्वरूप को ही बदल डाला है। अब ये केवल राजनैतिक संगठनों के हाथों की कठपुतली बन कर रह गए हैं। देश निर्माण में छात्र आंदोलनों की बड़ी भूमिका रही है, परंतु जाधवपुर विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में घटी कुछ घटनाओं ने इस सारे छात्र आंदोलन को, छात्रों के देश निर्माण में भूमिका को, कहीं न कहीं शर्मसार भी किया है। छात्रों को मर्यादित ढंग से अपने आंदोलन को साकार रूप देना चाहिए, न कि किसी बर्बरता का सहारा लेना चाहिए। विश्वविद्यालय प्रशासन, सरकार और छात्रों को यह समझना होगा कि विश्वविद्यालय शिक्षा के मंदिर हैं, इसे राजनीति का अखाड़ा न बनाया जाए।