कर्तव्य से पलायन का नाम भक्ति नहीं
   Date30-Nov-2019

धर्मधारा
(गतांक से आगे)
संत एकनाथ ने उससे पुन: प्रश्न किया-'और तुम्हारे बच्चे?Ó 'बच्चे भी सो रहे थे भगवन्! और उनको सोता हुआ देखकर मैं चुपचाप वहां से निकल भागा। महाराज, मैंने अब घर-गृहस्थी त्याग दी है और अब भगवान की सेवा करना चाहता हूँ।Ó संत एकनाथ उस व्यक्ति को समझाते हुए बोले-'वत्स! जिन भगवान की सेवा करने की इच्छा से तुम यहां आए हो, वे तो तेरे घर मेें ही हैं और तुमने उन्हें ही त्याग दिया। अरे भगवान तो घट घट व्यापी हैं। वे कहां नहीं हैं? वे तो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं। वे तो हर प्राणी के अंदर मौजूद हैं। हर व्यक्ति भगवान की ही कृति है। तुम्हारे माता-पिता, स्त्री, बच्चे सभी भगवान की ही कृति हैं। उनके अंदर उपस्थित भगवान को नमन करते हुए तुम उनके प्रति अपना कर्तव्यपालन करो। गृहस्थ धर्म पूरा करते हुए सदा भगवान का स्मरण किया करो। गृहस्थ धर्म पूरा करते हुए सदा भगवान का स्मरण किया करो, जिससे संसार के प्रति तुम्हारे मन में आसक्ति न हो और तुम मुक्त हो सको। यही सच्ची भगवद् भक्ति है। कर्तव्य से पलायन करने को भक्ति का नाम देना गलत है, बल्कि कर्तव्य पालन करते हुए भगवान का स्मरण करते हुए सदा सच्चाई के मार्ग पर चलना ही सच्ची भक्ति है। त्याग गृह का नहीं, कर्तव्यों का नहीं, बल्कि मन के विकारों का करो। इसी से भगवान तुम पर प्रसन्न होंगे। जाओ, वापस घर लौट जाओ।Ó संत एकनाथ के वचनों ने उस व्यक्ति का अज्ञान दूर कर दिया। उसका ह्रदय परिवर्तित हो गया और वह चुपचाप घर लौट गया। उसे अब नई जीवन-दृष्टि मिल चुकी थी। घर आकर अपने परिवार व समाज के प्रति अपने दायित्वों का पालन करते हुए ही वह ईश्वर भक्ति करने लगा। वास्तव में यही तो सच्ची ईश्वर भक्ति है, भगवद् भक्ति है। (समाप्त)