देश में 9 करोड़ 64 लाख हेक्टेयर भूमि का क्षरण
   Date30-Nov-2019

नई दिल्ली द्य 29 नवंबर (वा)
देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र की 29.32 प्रतिशत अर्थात नौ करोड़ 64 लाख हेक्टेयर भूमि का क्षरण हो रहा है जिसमें गोवा, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, झारखंड, नागालैंड, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश प्रमुख है।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने शुक्रवार को राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि वर्ष 2011-13 की अवधि में अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र की रिपोर्ट 'भारतीय मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण मानचित्रÓ के अनुसार देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र की 29.32 प्रतिशत अर्थात नौ करोड़ 64 लाख हेक्टेयर भूमि का क्षरण हो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया कि गोवा, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, झारखंड, नगालैंड, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश में 40 प्रतिशत से 70 प्रतिशत भूमि का मरुस्थलीकरण हो रहा है। भूमि के क्षरण का मुख्य कारण मानव बस्तियां, जल भराव, जल कटाव, वनों का समाप्त होना, बंजर एवं पथरीली भूमि का बढऩा शामिल हैं। उन्होंने कहा कि अगस्त 2019 में जारी 'जलवायु परिवर्तन एवं भूमिÓ के लिए अंतर सरकारी समूह की भूमि की विशेष रिपोर्ट के अनुसार भूमि के क्षरण में इस्तेमाल में परिवर्तन, मरुस्थलीकरण और भूमि का अतिक्रमण अहम कारण रहे हैं। श्री तोमर ने कहा कि भारत 2030 तक भूमि क्षरण को निष्प्रभावी करने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना को लागू कर रही है। इसके लिए राष्ट्रीय कृषि सतत् कृषि मिशन चलाया जा रहा है। इसके अलावा 23 राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों ने इस संबंध में अपनी- अपनी योजनाएं तैयार कर ली हैं। देश के 651 जिलों में जलवायु परिवर्तन के कृषि पर पडऩे वाले प्रभावों से निपटने के लिए योजना बना ली गई हैं।
दस वर्ष में गेहूं की पैदावार में 25 प्रतिशत तक की कमी
तापमान में हो रही वृद्धि के कारण अगले 10 वर्ष के दौरान गेहूं की पैदावार में छह से 25 प्रतिशत की कमी जबकि जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढऩे पर भी काबूली चना की पैदावार में 23 से 54 प्रतिशत तक वृद्धि का अनुमान है। कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने राज्यसभा में शुक्रवार को एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि तापमान में वृद्धि के कारण फसलों के उत्पादन में दो से तीन प्रतिशत की कमी होने का अनुमान है। वर्ष 2050 तक धान की पैदावार में सात प्रतिशत और वर्ष 2080 तक इसके उत्पादन में 10 प्रतिशत की कमी का अनुमान है। इस सदी के अंत तक गेहूं की पैदावार में छह से 25 प्रतिशत की कमी का आकलन किया गया है। वर्ष 2050 से 2080 के दौरान जलवायु परिवर्तन के कारण खरीफ-मक्का की पैदावार में 18 से 23 प्रतिशत की कमी होने की आशंका है।