कर्तव्य से पलायन का नाम भक्ति नहीं
   Date29-Nov-2019

धर्मधारा
सं त एकनाथ की ख्याति चहुँओर फैल चुकी थी। वे जहां भी जाते, वहां लोगों को धर्मोपदेश देते और नेकी व सच्चाई के रास्ते चलने की सलाह देते। वे अक्सर कहा करते - 'धर्म ही जीवन का आधार है। धर्मरहित जीवन वास्तव में पशुवत जीवन है। जैसे किसी वृक्ष की जड़ ही उस वृक्ष का आधार है, वैसे ही धर्मरूपी जड़ ही जीवनरूपी वृक्ष का आधार है। जैसे जड़ के बिना वृक्ष की कल्पना नहीं की जा सकती। वैसे ही धर्म के बिना जीवनरूपी वृक्ष की कल्पना नहीं की जा सकती। वृक्ष जड़ से जीवन रस पाता है, पोषण पाता है। वैसे ही जीवन भी धर्म से ही जीवन रस पाकर सुखी, सुंदर व सफल होता है।Ó
एक बार संत एकनाथ कहीं भ्रमण पर थे। अचानक एक व्यक्ति उनके पास आया और बोला - 'महात्मन्! मैं बहुत दूर से आपके दर्शन को आया हूँ। मैं नाना प्रकार के गृहकार्यों में व्यस्त रहता हूँ, जिसके कारण भगवदभक्ति के लिए समय नहीं निकाल पाता। अत: हे महात्मन्! मैं अब आपकी शरण में ही रहना चाहता हूँ और भगवद् भक्ति करना चाहता हूँ। अब मैं अपने घर वापस नहीं जाना चाहता। इसलिए अब आप मुझे अपने साथ ही चलने की और आपका एक शिष्य बनने की अनुमति प्रदान करें।Ó
'तुम अकेले हो या गृहस्थ धर्म का पालन करते हो?Ó - एकनाथ जी ने उससे पूछा। वह व्यक्ति बोला - 'भगवन्! मेरा विवाह हो चुका है। मेरी ी है, वृद्ध माता-पिता हैं एवं मेरे दो बच्चे भी है और मैं उन सबों का त्याग करके बड़ी आशा से आपके पास आया हूँ। इसलिए हे भगवन्! आप मुझे निराश न करें। आप मुझ पर दया करें।Ó
संत एकनाथ बोले - 'क्या तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें इसकी अनुमति दी है? क्या तुम्हारी ी ने तुम्हें इसकी अनुमति दी है?Ó इसके उत्तर में वह व्यक्ति कुछ सकुचाते हुए बोला - 'नहीं महात्मन्! वे सब तो सो रहे थे, तभी मैं चुपके से घर से निकल आया हूँ। वे सभी गहरी निद्रा में थे, तभी मैं वहां से चल दिया और आप तक पहुंचा हूँ। उन सबके जागते रहने पर तो मैं आप तक कैसे आ पाता, क्योंकि वे सब मुझे गृह त्याग करने ही नहीं देते।Ó (क्रमश:)