ईश्वर अनुभूति का मार्ग प्रार्थना का विज्ञान
   Date28-Nov-2019

धर्मधारा
ह मारी सत्प्रवृत्तियां धूल, धुंध और धुएं में खोई हुई है। धुंध जम गई है, ढूंढते हैं, खोजते हैं तो ये मिलती नहीं है, पता नहीं किस कोने में पड़ी हैं सत्प्रवृत्तियां। ये सत्प्रवृत्तियां ही हमारी देवशक्तियां हैं और हमारी इन देशशक्तियों को एकजुट होनाचाहिए, तभी वो बलवान होंगी।
हमारी विचारशीलता, हमारी विचारशक्ति इतनी कमजोर पड़ जाती है कि जब भी कोी संकट आता है, विपदा आती है तोसबसे पहले हमारे विचार खो जाते हैं, विचार ही नहीं पैदा होते। संकट के समय हमारी पुकार, हमारी स्तुतियां, स्तुतियों के पवित्र स्वर भी खो जाते हैं। ये सारी चीजें कहीं विलुप्त हो जाती हैं। हम तब भूल जाते हैं कि हमारे पास प्रार्थना की शक्ति है।
यदि प्रार्थना में ये सब शामिल हैं, जैसे - सत्प्रवृत्तियां हैं, विचारशीलता है, पुकार के मधुर स्वर हैं और सृजन चेतना है, धैर्य है, तो मात्र यह सुनिश्चित करने की जरूरत होती है कि वह प्रार्थना सर्वकल्याम के भाव से की जाए। ऐसी प्रार्थना उतनी ही व्यापक होती है और विराट स्वरूप परमेश्वर तक उतनी ही शीघ्रता से पहुंचती है। इसके अलावा एक तत्व और है, जिसके बिना प्रार्थना अधूरी व अपूर्ण रहती है, और यह तत्व है - प्रेम। प्रेम के बिना प्रार्थना भगवान तक सम्पूर्ण रूप से नहीं पहुंच पाती। प्रार्थना को सामान्य से विशेष बनाने वाले सभी तत्व यदि एक तरफ रख दिए जाएं और प्रेम दूसरी तरफ रख दिया जाए, तो प्रेम का पलड़ा उन पर भारी पड़ेगा। प्रेम ही वह तत्व है, जो हमारी भावनाओं को एकजुट करता है और हमारी प्रार्थना को बिना किसी अवरोध के प्रभु तक पहुँचाता है। इसी कारण गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस में भगवान शिव कहते हैं - हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।। अर्थात् जिन हरि को, जनि परमेश्वर को, जिन परमात्मा को आप लोग ढूंढ रहे हो, वो प्रभु तो सर्वव्यापी हैं, सर्वत्र व्याप्त हैं और वो तो केवल प्रेम करने से मिलते हैं। प्रार्थना में सब कुछ और प्रेम न हो तो बात अधूरी रह जाती है।