गर्व का परिणाम
   Date20-Nov-2019

प्रेरणादीप
अ हंकार का मद अधिक देर नहीं टिकता। बहुत शीघ्र ही इसके परिणाम सामने आते हैं। एक दिन हवा जोर से चलने लगी। धरती की धूल उड़-उड़कर आसमान पर छा गई। धरती से उठकर आकाश पर पहुँच जाने पर धूल को बड़ा गर्व हो गया। वह सहसा कह उठी-'आज मेरे समान कोई भी ऊँचा नहीं। जल, थल, नभ के साथ दसों दिशाओं में मैं-ही-मैं व्याप्त हूँ।Ó
बादल ने धूल की गर्वोक्ति सुनी। उसने धूल की भूल पर थोड़ा अट्टहास किया और अपनी धाराएँ खोल दीं। देखते-ही-देखते धूल आसमान से उतरकर जमीन पर पानी के साथ बहती दिखलाई देने लगी, दिशाएँ साफ हो गईं। कहीं भी धूल का नामोनिशान न रहा। पानी के साथ बहती हुई धूल से धरती ने पूछा- 'रेणुके! तुमने अपने उत्थान-पतन से क्या सीखा?Ó धूल ने कहा-'धरती माता! मैंने सीखा कि उन्नति पाकर किसी को गर्व नहीं करना चाहिए। गर्व करने वाले मनुष्य का पतन अवश्य होता है।Ó