लक्ष्य निर्धारण का पहला चरण आत्मनिरीक्षण
   Date20-Nov-2019
 
धर्मधारा
जी वन में सही लक्ष्य का निर्धारण एक महत्वपूर्ण पहलू है, जिसके अभाव में जीवन एक दिशाहीन नैया की भाँति संसार सागर की लहरों के बीच हिचकोले खाता रहता है, लेकिन पहुँचता कहीं नहीं। प्राय: लोकचलन, घर-परिवार के बड़े-बुजुर्गों की इच्छा लक्ष्य निर्धारण के प्रमुख कारक रहते हैं। इनमें कुछ बुरा भी नहीं, यदि यह सब अपनी इच्छा एवं अंत: प्रेरणा के अनुरूप होता हो। अन्यथा देखा-देखी या दबाव में अपनाया गया जीवन लक्ष्य उस सार्थकता का बोध नहीं दे पाता, जिसका इनसान इस सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने के नाते हकदार है। सही लक्ष्य के अभाव में जीवन उपलब्धियों से भरा होने के बावजूद, उस सुकून से रीता रह जाता है, जिसकी वह आकांक्षा रखता है। सब कुछ होने के बावजूद व्यक्ति स्वयं को पूर्णता के बोध से कोसों दूर पाता है।
जीवन लक्ष्य का निर्धारण बहुत सरल कार्य भी नहीं है। बहुत सौभाग्यशाली हैं वे लोग जिनका जीवन लक्ष्य स्पष्ट है, अन्यथा इनसान भ्रामक लक्ष्यों में खोया मन को बहलाता फिरता है, उसका पूरा जीवन जैसे मृगमरीचिका के पीछे भटकते बीत जाता है और जीवन की विदाई के पलों का एक दु:खद आह के साथ त्रासद अंत होता है। अत: जीवन लक्ष्य में हो रही चूक का समय रहते परिमार्जन किया जाए, इसका पुनर्निधारण किया जाए, तो इसे समझदारी वाला कदम माना जाएगा। जीवन लक्ष्य का निर्धारण करते समय निम्न बातों का ध्यान रखें। लक्ष्य रुचि के अनुरूप हो तो जीवन सरल-सहज बन जाता है। सर्वविदित है कि रुचिपूर्ण कार्य पर मन स्वत: ही एकाग्र हो जाता है और कार्य में मन लगता है। रुचि के कार्य सामने होने पर व्यक्ति टालमटोल नहीं करता, उनको प्राथमिकता के आधार पर निपटाता है व पूरा करता है। यदि कार्य रुचि का न हो तो व्यक्ति उसे बेगार की तरह ढोता फिरता है और उसके लिए समय के अभाव का रोना रोता रहता है। लक्ष्य का रुचि के अनुरूप होना एक बहुत बड़ा कारक है, जो जीवन को सरल एवं सुरुचिपूर्ण बनाता है। लक्ष्य का अपनी क्षमता, प्रतिभा एवं योग्यता के अनुरूप होना भी एक महत्वपूर्ण कारक है। अपनी नैसर्गिक प्रतिभा एवं योग्यता के अनुरूप यदि लक्ष्य का निर्धारण हो तो कार्य में सफलता एवं सिद्धि का समय पर मिलना सुनिश्चित हो जाता है अन्यथा धारा के विपरीत तैरने जैसी परिस्थिति का सामना करना पड़ता है। हालांकि यदि हमारी रुचि हो तो अपनी मनचाही क्षमता का विकास अपने श्रम एवं पुरुषार्थ के आधार पर भी किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए आवश्यक धैर्य, जीवट एवं अध्यवसाय का होना अनिवार्य है, जो सबके लिए संभव नहीं होता और जिसमें प्राय: चूक हो जाती है। लक्ष्य का उपयोगी होना भी आवश्यक है, जिससे न केवल स्वयं का जीवन सँवरता हो, समृद्ध होता हो, बल्कि समाज का भी हित सधता हो। दूसरों के शोषण एवं समाज के अहित पर आधारित आत्मकेन्द्रित लक्ष्य किसी भी रूप में वरेण्य नहीं माना जा सकता।