स्वदेश : चरैवेति-चरैवेति...
   Date08-Oct-2019

विशेष टिप्पणी
शक्तिसिंह परमार
अविराम यात्रा का नाम है स्वदेश... विजयादशमी पर्व पर 53 वर्ष पूर्व ख्यात आयुर्वेदाचार्य पं. रामनारायण शाीजी द्वारा रोपे गए एवं राष्ट्रऋषि कुप्प.सी. सुदर्शनजी द्वारा पल्लवित स्वदेश की राष्ट्रनिष्ठ विचार-समाचार यात्रा का वह पौधा आज 'वृहद वटवृक्षÓ का रूप ले चुका है.., जिसकी संपूर्ण मप्र से लेकर छत्तीसगढ़, राजस्थान तक में शाखाएं फैल चुकी हैं... भारतीय धर्म-संस्कृति में 'चारों वेदोंÓ के सत्यों को आत्मसात किया गया है.., लेकिन इन्हीं वेदों की बातों/प्रेरक प्रसंगों को विश्लेषित करने का कार्य एवं जनहित में परोसने का विचार सिर्फ स्वदेश ही करता रहा है.., करता है और करता रहेगा... क्योंकि स्वदेश लोकतंत्र में अपनी भूमिका को 'चौथे स्तंभÓ के रूप में ही नहीं देखता और स्वीकारता, बल्कि 'वेद पत्रकारिताÓ की भूमिका का निर्वाह भी पूरी प्रतिबद्धता के साथ 53 वर्षों से 'अविराम वैचारिक यात्राÓ के रूप में सतत् करता रहा है और करता भी रहेगा.., क्योंकि स्वदेश ने रा.स्व.संघ के गीत को ही अपना ध्येय बनाकर समाज-राष्ट्र के लिए स्वयं को इसी भाव के साथ समर्पित किया है...
चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना।
नहीं रुकना, नहीं थकना, सतत् चलना-सतत् चलना।।
आज भले ही भूतकाल की तुलना में स्वदेश के लिए कितनी ही अनुकूल स्थितियां हों.., लेकिन रीति-नीति के मान से और सत्ता-विचार के आईने में आज स्वदेश पर पहले से कहीं ज्यादा जिम्मेदारियां हैं.., क्योंकि स्वदेश जैसे वैचारिक अधिष्ठान के लिए आज 32 दांतों के बीच में भी रहकर 'जिव्हाÓ की भांति कार्य करने की जिम्मेदारी है.., जिसमें राष्ट्र-समाज ही उसके लिए पहले पायदान पर है... राष्ट्र की कीमत पर सत्ता के सुर में सुर मिलाना न तो स्वदेश का भाव है और न ही ध्येय... फिर आज तो वैचारिक संघर्ष को भिड़ाने-भड़काने के नित-नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, ऐसे दौर में वैचारिक पत्रकारिता के जरिए स्वदेश की जिम्मेदारी पहले से भी कहीं ज्यादा बढ़ गई है... क्योंकि जब किसी भी संचार माध्यम के लिए समाचार को अप्रत्यक्ष ोतों से या फिर उलटे-सीधे साधनों-संसाधनों से बटोरकर समय से पहले प्रकाशित-प्रसारित करना पूर्णत: वर्जित है.., क्योंकि इसे पत्रकारिता और पत्रकारों के धर्म के विपरीत माना गया है... अब ऐसी स्थिति में तो विचार के साथ समाचार का दावा करने वाले स्वदेश के साथ सत्य की बंदिशें और ज्यादा कठोर रूप में लागू होती हैं.., जिसका प्रतिपालन भी स्वदेश ने समय-समय पर साहसपूर्वक करके दिखाया है... यही बातें तो स्वदेश की थाती हैं... चरैवेति-चरैवेति गीत का यही तो भाव है...
हमारी प्रेरणा भारत है, भूमि की करें पूजा।
सुजला सुफला सदा स्नेहा, यही तो रूप है उसका,
जियें माता के कारण हम, करें जीवन सफल अपना।।
आज बुराई पर अच्छाई का प्रतीक विजयादशमी पर्व है... बुराई के खिलाफ लडऩा आसान नहीं है और फिर एक-दो दिन की बात हो तो ठीक, अगर संघर्ष दशकों लंबा हो जाए तो इसके लिए साधना, साधन और साध्य तीनों की पवित्रता नितांत जरूरी है.., तभी लक्ष्य संधान होता है... स्वदेश ने इस मामले में अपने वैचारिक अधिष्ठान की प्रतिष्ठा को कभी धूमिल नहीं होने दिया.., तभी तो वैचारिक रूप से भले ही देश-प्रदेश में कितनी ही सत्ताएं बदली हों.., लेकिन स्वदेश का विचार प्रवाह कभी डगमगाया नहीं और न ही विपरीत धारा की तरफ मुडऩे को वह कभी मूल्यों से समझौता करते हुए विवश हुआ... 53 वर्ष पूर्व 'राष्ट्रचिंतनÓ से उद्घाटित हुआ 'स्वदेश मंत्रÓ आज स्वयं में 'वेदÓ बन गया है... जिसकी 'अविरामÓ यात्रा का आज 54वां अध्याय प्रारंभ हो रहा है... जी हां, आश्विन शुक्ल 10 (विजयादशमी) अर्थात् 23 अक्टूबर 1966 को 'राष्ट्रीय विचारोंÓ के सजग प्रहरी के रूप में स्वदेश ने अपना पहला कदम बढ़ाया था... दशकों प्रतिकूल परिस्थितियों का डटकर सामना करते हुए.., भांति-भांति के झंझावतों से पार पाते हुए और दो-दो बार की तालाबंदी के 'साजिशन मकडज़ालÓ को ध्वस्त करते हुए 'स्वदेशÓ ने अपना 'राष्ट्र समर्पितÓ विचार भाव निरंतर गुंजायमान रखा... सत्तासीन हथकंडों के बाद भी 'स्वदेशÓ ने 'विचार-समाचारÓ के प्रचार-प्रसार का 'सत्यानुष्ठानÓ निरंतर जारी रखा... तभी तो इस राष्ट्रहितैषी अभियान को न तो सलाखें रोक/बांध सकी और न ही तानाशाही सत्ताएं इसका कुछ बिगाड़ पाईं... क्योंकि स्वदेश का अटल भाव तो यही था...
क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले, यह भी सही, वह भी सही।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
हमें पूर्ण विश्वास है... स्वदेश के सुधी पाठकों, हितचिंतकों का सहयोग, प्यार और विश्वास इस वैचारिक यात्रा के साथ निरंतर बना रहेगा और समय के साथ उत्तरोत्तर बढ़ता रहेगा...
श्चड्डह्म्द्वड्डह्म्ह्यद्धड्डद्मह्लद्ब८०ञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व