लोक निर्माण का वैज्ञानिक रूप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
   Date08-Oct-2019

डॉ. भागीरथ कुमरावत
भा रतीय राजनीति एवं शैक्षणिक जगत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं इसका सैद्धांतिक पक्ष देश की स्वतंत्रता के बाद से ही बहस के केन्द्र में रहा है। किसी भी राष्ट्रव्यापी संस्था के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं संगठनात्मक दृष्टिकोण को समझना हो तो उसके संस्थापक के जीवन और वैचारिक पक्ष का जानना आवश्यक होता है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार है तथा संघ और डॉ. हेडगेवार एक-दूसरे के पर्याय है। किसी संस्था के वैचारिक पक्ष से हम सहमत या असहमत हो सकते हैं, परंतु जिस संस्था का प्रभाव क्षेत्र न केवल भारत में हो, बल्कि वैश्विक हो उसके संस्थापक के जीवन एवं विचारों से अनभिज्ञ रहना अनेक भ्रांतियों को जन्म देता है। इसके कारण किसी संस्था के वैचारिक पक्ष का मूल्यांकन भी नहीं हो पाता और उसके स्वयंसेवकों की देश भक्ति को भी परख नहीं पाते हैं। डॉ. हेडगेवार के संबंध में अनेक भ्रांतियां उत्पन्न हुई, उनमें से एक यह भी है कि उनका स्वतंत्रता आंदोलन में अलिप्त रहना, जबकि यह तथ्य सच्चाई से परे हैं।
सन् 1921 में मध्यभारत की राजधानी नागपुर में ब्रिटिश सरकार ने उन पर 'राजद्रोहÓ का मुकदमा चलाया था, जानते हो क्यों? मुकदमें की सुनवाई के दौरान उन्होंने उपनिवेशवाद को अमानवीय, अनैतिक, अवैधानिक एवं क्रूर शासन की संज्ञा देते हुए न्याय व्यवस्था, पुलिस, प्रशासन एवं राजसत्ता के खिलाफ सभी प्रकार के विरोधों का समर्थन किया था। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उन्हें खतरनाक राजनीतिक अपराधी माना था। स्कूल में छात्रों का नेतृत्व करते हुए वन्दे मातरम् की उद्घोषणा करने एवं इसके लिए माफी न मांगने के लिए उन्हें स्कूल से निष्कासित कर दिया गया। सविनय अवज्ञा आंदोलन में सत्याग्रह का नेतृत्व करने पर गिरफ्तार हुए और उन्हें नौ महिने का सश्रम कारावास की सजा मिली थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान क्रांति की आशा एवं योजना के लिए उनकी तरफ नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती जैसे महान क्रांतिकारी आकृष्ट हो रहे थे।
स्वाधीनता आंदोलन में डॉ. हेडगेवार की भागीदारी के अनेक रूप एवं घटनाएं देखने को मिलती है, परंतु उनकी गतिविधियां और चिंतन राष्ट्र की स्वतंत्रता तक ही सीमित नहीं थी। वे सोचते थे कि एक साधन सम्पन्न और समृद्धशाली भारतीय राष्ट्र का पराभव क्यों हुआ? पुन: सबल एवं संगठित राष्ट्र कैसे बनाया जा सकता है? इन प्रश्नों का समाधान एक स्वप्नदृष्टा के रूप में वह जीवनपर्यन्त ढूंढते रहे तथा वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि राष्ट्र का पुन: निर्माण एवं समाज के सगंठन के लिए किया गया कार्य ही 'ईश्वरीय कार्यÓ होता है। इसी ध्येय को अपना लक्ष्य बनाकर सन् 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी।
स्वतंत्रता के पश्चात् अनेक वर्षों तक राजनैतिक दल विशेष कर कांग्रेस पार्टी द्वारा मीडिया से लेकर सर्व समाज में यह भ्रम फैलाया जाता रहा की संघ और संघ की विचारधारा को मानने वाले लोग हिन्दुस्तान को केवल हिन्दुओं का देश मानते हैं। जबकि संघ के द्वारा चलाए जा रहें सेवा कार्यों का विश्लेषण करने पर पाते हैं कि देश में प्राकृतिक आपदा, बाढ़, भूकम्प, महामारी आदि में संघ के स्वयंसेवकों ने बिना भेदभाव के सदैव सभी वर्ग जाति के लोगों के बीच जाकर सेवा कार्य करते आ रहे हैं। सन् 1988-89 में दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीतिक विज्ञान के एक छात्र के रूप में राकेश सिन्हा ने 'क्कशद्यद्बह्लद्बष्ड्डद्य ढ्ढस्रद्गड्डह्य शद्घ ्य.क्च. ॥द्गस्रद्दद्ग2ड्डह्म्Ó विषय पर पहली बार शोध कार्य किया। उसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका एवं डॉ. हेडगेवार के जीवन पर बहुत खोजपूर्ण तथ्य सामने लाए गए।
सन् 1889, 1 अप्रैल, प्रतिपदा का दिन था। महाराष्ट्र में प्रतिपदा यानि गुड़ी पड़वा अर्थात नए वर्ष का पहला दिन होता है। इस दिन मुखियां द्वारा गुड़ी फोड़ी जाकर घर के ऊपर भगवा ध्वज फहराया जाता है। यह दिन भारत के इतिहास की घटनाओं, राष्ट्र की अस्मिता, सांस्कृतिक परम्पराओं, वीर पूर्वजों की विरासत का यशस्वी बोध कराता है। यदि किसी घर में इस दिन पुत्र रत्न की प्राप्ति हो तो इसे प्रकृति की महान कृपा कहा जाएगा। ऐसी ही खुशी का अवसर नागपुर के गरीब ब्राह्मण बलिराम पंत हेडगेवार के परिवार में बालक केशव के जन्म लेने पर था।
कहावत है कि 'पुत्र के पॉव पालने में दिखाई देते हैं।Ó यह कहावत चरितार्थ करने वाला बालक केशव था। बचपन से ही बालक में विरोचित गुणों का भण्डार था तथा देश भक्ति की अनेक घटनाएं घटी थी। जैसे - = 20 जून 1897 के दिन ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के 60 वर्ष पूर्ण होने पर भारत में जश्न मनाया जा रहा था। केशव के स्कूल में भी जश्न मनाकर मिठाई बांटी गई परंतु केशव ने यह कहकर मिठाई खाने से इंकार कर दिया की वह हमारी महारानी तो नहीं है। अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाकर रखा है और हम उनकी खुशी में शामिल कैसे हो सकते हैं? = दूसरी घटना सन् 1901 की है। इंग्लैण्ड के राजा एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के अवसर पर राज्यनिष्ठ लोगों द्वारा नागपुर में आतिशबाजी का आयोजन रखा। इस बात पर बालक केशव ने अपने बाल मित्रों को उस आयोजन को देखने जाने से मना किया और उन्हें समझाया कि विदेशी राजा के राज्यारोहण सीताबर्डी किले पर इंग्लैण्ड के ध्वज 'यूनियन जैकÓ का फहराना उनके बाल मन को कचोटता था। अर्थात् जिस आयु में अन्यान्य बालक खेलने-कूदने में समय जाया करते हैं, उसी आयु में बालक केशव के मन में अंग्रेजों को भारत के बाहर निकालने का उपाय सुझता रहता था।
बाल केशव के मन पर शिवाजी की वीरता, संकल्प शक्ति एवं राष्ट्रीय भाव का अटूट प्रभाव था। इसीलिए उनके जन्म पर यह कहां और समझा गया था कि बचपन का केशव आधुनिक भारत के निर्माण की संकेत-रेखा है, जो आगे चलकर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के रूप में यशस्वी हुआ। दुनिया का इतिहास बताता है कि व्यक्ति के जीवन में उसके कर्मों से उसे यश मिलता है और मृत्युपरांत उसकी यशोगाथा इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाती है परंतु डॉ. हेडगेवार वर्तमान एवं भविष्य दोनों के साथ जुड़े हैं। यही कारण है कि उनकी प्रसिद्धि उनके अनुयायियों के रूप में जीवनकाल से अधिक मृत्युपरांत हो रही है। आदर्श राष्ट्रवाद एवं कर्मयोग को अमूर्त से मूर्त बनाने का जो काम उन्होंने किया वह सम्भवत: भारतीय राष्ट्र के भाग्योदय की योजना ही कहा जा सकता है। हाल ही में 5 अगस्त 2019 को भारतीय संसद में जो घटा और जम्मू-कश्मीर से धारा 370 व आर्टिकल 35ए को निष्प्रभावी किया गया यह राष्ट्रवाद और कर्मयोग का संयोग ही तो था।
सन् 1909-10 तक बंगाल और मध्यभारत के क्रांतिकारियों के बीच संबंध गहराने लगे थे। दोनों प्रांतों में क्रांतिकारियों का आना-जाना भी शुरू हो गया था। डॉ. हेडगेवार का भी सम्पूर्ण समय इन्हीं गतिविधियों में बीता जाने लगा। उन दिनों कलकत्ता क्रांतिकारियों के लिए काशी के समान था। केशव के मन में भी कलकत्ता जाकर वहां के क्रांतिकारी आंदोलन से जुडऩे की मन में तीव्र अभिलाषा थी। कहते हैं न कि राष्ट्र के लिए नि:स्वार्थ भाव से किए जाने वाले हर कार्य में ईश्वर सहायता करता है। इसी प्रकार एक सुअवसर आया और केशव को माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिला गया। हेडगेवार कलकत्ता पहुंचते ही अनुशीलन समिति से जुड़ गए और उनके प्रयासों से अनेक क्रांतिकारियों को उस समिति से जोड़ा गया। इस प्रकार हेडगेवार ने जल्दी ही समिति में अपना विश्वसनीय स्थान बना लिया था।
उस समय के 'बंगलार विल्पववादÓ पुस्तक के प्रसिद्धि पाने वाले लेखक नलिनी किशोर गुह ने हेडगेवार के बारे में लिखा था कि हेडगेवार सच्चे अर्थों में आदर्श क्रांतिकारी थे और इसी कारण उन्हें क्रांतिकारियों के बीच सबसे बड़ा पद नाम 'कोकेनÓ मिला था। अतिगोपनीय सारे काम हेडगेवार ही करते थे। कलकत्ता के मेडिकल कॉलेज के छात्र के रूप में केवल पांच वर्ष का मिला अल्पसमय में वहां के राष्ट्रवादी नेताओं एवं क्रांतिकारियों के बीच एक लोकप्रिय व्यक्ति के रूप में उभरकर सामने आए थे। इन सब गतिविधियों में सक्रिय रहने के बावजूद मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई में अव्वल नम्बर के दर्जे से उत्तीर्ण होते रहें और सितम्बर 1914 में 70.8 प्रतिशत अंकों के साथ चिकित्सा की डिग्री प्राप्ति उपरांत एक वर्ष सन् 1915 में व्यावहारिक चिकित्सक का कार्य पूर्ण करके हेडगेवार डॉक्टर बनकर नागपुर वापस लौटे।
डॉ. हेडगेवार के नागपुर लौटने पर उन्होंने आत्मचिंतन किया। परिवार की आर्थिक स्थिति, स्वजनों एवं मित्रों की अपेक्षाओं से तनिक भी विचलित न होना एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए कितना कठिन होता है कि परिवार को संकट में देखकर भी अपनी ऊर्जा प्रतिभा और समय का उपयोग धनोपार्जन में न करके समाज व राष्ट्र के व्यापक हितों में करता है। निश्चय ही डॉ. हेडगेवार के अंदर उस समय अध्यात्मजनित देश भक्ति की प्रबल भावना थी जिसके कारण वे स्वयं से साक्षात्कार करते हैं। अर्थात् उन्हें आत्मबोध एवं आत्मदर्शन हुआ कह सकते हैं। डॉ. हेडगेवार ने स्व का मूल्यांकत किया और सांसारिकता से परे उठकर राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर राष्ट्रोन्नति में अपनी भूमिका को निश्चित किया। परिणाम स्वरूप अपने मौलिक चिंतन, उच्च आदर्शों एवं प्रबल इच्छाशक्ति के बल पर आत्ममंथन की प्रक्रिया से जीवन में क्रांतिकारी मार्ग को छोड़कर नए रास्ते और नई भूमिका एवं नए दर्शन की खोज करके सन् 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के साथ अपने द्वारा राष्ट्रोन्नति के मार्ग को स्वयं प्रशस्त करते हैं।
डॉ. हेडगेवार का यह मानना था कि आज यदि हम परतंत्र है तो इसका कारण हमारी कायरता है। हमें एक राष्ट्र, शुद्ध राष्ट्रीयता और भ्रातृत्व का बोध नहीं है। तभी तो मु_ीभर अंग्रेजों ने करोड़ों भारतीयों को गुलाम बनाकर रखा है। डॉ. हेडगेवारजी के मन में उन दिन यह प्रश्न उठता था कि-क्या हम अंग्रेजों को परास्त नहीं कर सकते हैं? और इस बात का समाधान उन्हें राष्ट्र के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने में दिखाई पड़ता था। उन्हें लगता था कि तन-मन-धन से बुद्धि, विवेक, आत्मा सब में एक ही बात का बोध होने पर समाज को संगठित कर भाव दूर करने का कार्य किया जाए तो जीवन का इससे बड़ा सकारात्मक सदुपयोग और कुछ भी नहीं हो सकता है। उन्होंने मन में किसी प्रकार अंतद्र्वद नहीं पालते हुए ब्रह्मचर्य रहने का निर्णय कर संन्यासी का जीवन समाज के बीच रहकर व्यतीत करना यह निर्णय उनकी प्रकृति के अनुकूल था। संघ में यह व्यवस्था उनके स्वयं के जीवन से चालू की गई परम्परा संघ प्रचारक के रूप में सतत् नदी के प्रवाह के समान आज तक चली आ रही हैं और जब तक समाज के बीच संघ रहेगा यह परम्परा रहेगी।
विजयादशमी के दिन सन् 1925 में नागपुर शहर में मोहिते के बाड़े में स्थापित की गई। संघ की पहली शाखा में स्वयं डॉ. हेडगेवार द्वारा 5-10 शिशु-बाल स्वयंसेवकों को साथ लेकर प्रतिदिन मातृभूमि की धूल में खेल-खेल कर राष्ट्रीयता के गुणों से ओत-प्रोत करने कार्य शुरू हुआ। धीरे-धीरे महाराष्ट्र के प्रमुख नगरों-पूना, मुम्बई के साथ-साथ मध्यभारत प्रांत के खण्डवा, इन्दौर, उज्जैन, ग्वालियर, जबलपुर, भोपाल, गोंदिया, रायपुर आदि नगरों में संघ की शाखाओं का विस्तार होते चला गया। डॉ. साहब के अथक प्रयासों और परिश्रम से अब उनका शरीर भी थकने लगा था। उन्होंने संघ में स्वयंसेवकों को संघ की शिक्षा देने के लिए 0.ञ्ज.ष्ट (ह्रद्घद्घद्बष्द्गह्म् ञ्जह्म्ड्डद्बठ्ठद्बठ्ठद्द ष्टड्डद्वश्च) लगाने की परम्परा भी चालू की थी। सन् 1940 में संघ के ऐसे एक कैम्प (शिक्षण वर्ग) में देशभर के लोग नागपुर प्रशिक्षण प्राप्त करने आए हुए थे। उन दिनों वे बहुत बीमार थे परंतु उनके बिल पॉवर को देखते हुए वे एक दिन सभी स्वयंसेवकों के दर्शन हेतु मैदान पर आए। वहां स्वयंसेवकों की भारत के कोने-कोने से उपस्थिति देखकर उनके मुख से यह उदगारित हुआ की आज मैं समृद्ध और सशक्त भारत का लघु रूप देख रहा हूं। संघ स्थापना के साथ ही उन्होंने मनोकामना की थी कि- 'याचि देही-याचि डोलाÓ अर्थात् वे चाहते थे की इन्हीं आंखों से और इसी शरीर से संघ को सम्पूर्ण भारत में फैलता देख सकूं और यह सन् 1940 में नागपुर के संघ शिक्षा वर्ग में उन्होंने प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया। उन्होंने अपने राष्ट्र के प्रति इच्छा पूरी होते देख 2 जून 1940 को देह त्याग दी। उनकी अंतिम यात्रा में उमड़े जन-सैलाब को देखते हुए 'हितवादÓ ने अपने सम्पादकीय में लिखा था, कि डॉ. हेडगेवार से अधिक कुशल संगठनकर्ता देश को मिलना दुर्लभ होगा।
सन् 1940 में डॉ. हेडगेवारजी की मृत्यु के बाद संघ प्रमुख के रूप में श्री माधव सदाविशराव गोलवलकर ने कार्य सम्भाला जिन्हें संघ क्षेत्र में श्री गुरुजी नाम से ही पुकारा जाता था। श्री गुरुजी का जन्म 19 फरवरी 1906 में नागपुर में हुआ था। उनके पिता श्री सदाशिवराव एक शिक्षक थे तथा माता लक्ष्मी ग्रहणी थीं। पिताजी बड़े प्यार से उन्हें सवाई माधवराव कहके पुकारते थे और घर वाले मधु कहकर। कहावत है कि 'होनहार बिरवान के होते चीकने पातÓ श्री गुरुजी इसी कहावत को चरितार्थ करते हुए उत्तरोत्तर आगे बढ़ रहे थे। उनकी शिक्षा एम.एससी वनस्पति शास्त्र एवं एलएलबी तक हुई थी। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया था। उन्हें हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत तथा मराठी भाषा का गहराई का ज्ञान था। वे पश्चिमात्यों व पौर्वात्यों के दर्शन शास्त्र के ज्ञाता थे। वहीं काशी में रहते उनकी डॉ. होडगेवारजी से भेंट हुई। तीन वर्ष तक पढ़ाने के बाद वे नागपुर लौट आए।
एक दिन अचानक किसी को बिना बताए हिमालय की गिरिकंदराओं में तपस्या करने के विचार से नागपुर से निकल पड़े। परिवार और संघ के मित्रगण आदि सभी चिंतामग्न हो गए। गंगा किनारे स्थान खोजते-खोजते कलकत्ता से उत्तर में 120 कि.मी. दूर सारणाछी नामक का गांव है, वहां सन् 1896 में श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्य और श्री विवेकानंद के गुरु भाई अखण्डानंद प्रवास करते करते पहुंचे थे। उस गांव में लोगों की गरीबी और दारिद्रता सुन देखकर कुछ समय वहां रूकने का निर्णय कर अखण्डानंदजी ने उन गांव वालों की सहायता करना शुरू किया परंतु विधि को कुछ और स्वीकार था वे सदैव के लिए आश्रम बनाकर रहने लगे थे। गुरुजी उसी आश्रम पहुंचे और मोक्ष मार्ग का पाठ सीखने हेतु उन्हें अपना गुरु बनाया। इनकी सेवा से अखण्डानंदजी बहुत प्रसन्न हुए और 13 जनवरी 1937 को श्री गोलवलकरजी को गुरुमंत्र देकर उन्हें अपना शिष्य बनाया। अखण्डानंदजी ने श्री गोलवलकरजी को ओदश दिया की तुम्हें हिमालय जाकर गिरिकन्दराओं में तपस्या करने नहीं बैठना, तुम्हें तो जनमानस का कार्य करना है। 'कार्य तुम्हारी बाट जोह रहा है।Ó 7 फरवरी 1937 को अखण्डानंदजी ब्रह्मलीन हो गए तत्पश्चात् श्री गुरुजी भी सारणाछी से नागपुर लौट आए।
सन् 1938 मई-जून में नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी सर्वाधिकारी थे। वर्ग में सभी स्वयंसेवकों की चिंता करना, उनसे मिलकर प्रत्यक्ष परिचय, सभी व्यवस्थाओं को बारीकी से देखना परखना आदि कार्य करते हुए सबके प्रिय हो गए। सन् 1940 में डॉ. हेडगेवारजी के दिवंगत होने पर श्री गुरुजी को 3 जुलाई 1940 को रेशिमबाग संघ शाखा में प्रथम प्रणाम देकर उन्हें सरसंघचालक घोषित किया गया। श्री गुरुजी ने अखण्ड रूप से 33 वर्षों तक सतत् नदी के निर्मल जल-प्रवाह की तरह सम्पूर्ण देशभर में प्रवास किया। श्री गुरुजी के सरसंघचालक रहते हुए संघ कार्य चहुदिशा में समाज के हर वर्ग तक, समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र तक में फैलाव हुआ। संघ जीवन के अनेक पहलू है। उनमें से एक महत्व का पहलू है निजी संबंध, व्यक्तिगत संबंध, मित्रता के संबंध श्री गुरुजी ने इन संबंधों को बड़ी तत्परता से जीया था। वे केवल संघ के सरसंघचालक ही नहीं थे, वे हजारों-लाखों स्वयंसेवकों के मित्र थे, बड़े भाई थे, पिता संरक्षक और पथ प्रदर्शक थे। संघ इन्हीं संबंधों के कारण आगे बढ़ता आया है आज भी बढ़ रहा है और आगे भी बढ़ेगा।
श्री गुरुजी एक आध्यात्मिक पुरुष थे। उन्होंने अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा के बल पर संघ कार्य को भी समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार करने की योजना से देशभर में प्रवास करना और स्वयंसेवकों को विभिन्न क्षेत्रों में जाकर वहां समाजोन्नति की दृष्टि से कार्य खड़ा करने हेतु प्रेरित करते थे। श्री गुरुजी द्वारा सन् 1940 में संघ की बागडोर सम्भालने के पश्चात् समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में संघ कार्य को अन्यान्य रूपों में विस्तारित किया गया। इनमें से प्रमुख कार्य है शिक्षा के क्षेत्र में 1946 में गीता विद्यालय कुरूक्षेत्र हरियाणा में तथा 4 जुलाई 1952 को गोरखपुर उ.प्र. में पहला सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की गई। महिलाओं को सशक्तिकरण की दृष्टि से 25 अक्टूबर 1936 को राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना लक्ष्मीबाई केलकर द्वारा हुई। प्रकशन के क्षेत्र में 1947 में भारत प्रकाशन, 14 जनवरी 1948 को पाञ्चजन्य 1947 को आर्गनाइजर और राष्ट्रधर्म समाचार पत्रों की शुरुआत की गई। विद्यार्थीयों के क्षेत्र में 9 जुलाई 1949 को अ.भा. विद्यार्थी परिषद का गठन श्री बलराज मधोक द्वारा हुआ। राजनीति के क्षेत्र में 20/10/1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने की। मजदूरों और किसानों को संगठित करने की दृष्टि से 23/7/1955 को भारतीय मजदूर संघ और 4/3/1979 को भारतीय किसान संघ की स्थापना श्री दत्तोपंत हेगड़ीजी द्वारा की गई। धर्म के क्षेत्र में 12/1/1963 को भारत विकास परिषद को डॉ. सूरज प्रकाश द्वारा और 21/5/1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना माधव सदाशिव गोलवलकर एवं स्वामी चिन्मयानंद द्वारा की गई। 1972 में दीनदयाल शोध संस्थान नानाजी देशमुख तथा विवेकानंद केन्द्र की स्थापना एकनाथ रानाड़ेजी द्वारा की गई। इसी प्रकार 1974 में ग्राहक पंचायत, 1978 में सहकार भारती, 1979 में सेवा भारती तथा 1981 में संस्कार भारती का गठन हुआ। 1982 में भारतीय विचार के पी. परमेश्वरनजी द्वारा, 14/4/1983 में सामाजिक समरसता मंच तथा 24/11/1986 को राष्ट्रीय सिख संगत का गठन हुआ। इसी प्रकार 1990 में प्रज्ञा भारती व हिन्दू जागरण मंच, 22/11/1991 में स्वदेशी जागरण मंच तथा 1992 में क्रीड़ा भारती व विज्ञान भारती की स्थापना हुई। 1992 में अधिवक्ता परिषद, 1993 में पूर्व सैनिक सेवा परिषद न राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, 25/5/1994 को इतिहास संकलन समिति की मोरेपंतजी पिंगले ने तथा 1996 में संस्कृत भारती का गठन च.मु. शास्त्री द्वारा हुआ। वर्तमान में संघ के एक सौ से अधिक अनुषांगिक संगठन है जो अलग-अलग अपनी प्रकृति के अनुसार कार्य कर रहे हैं। ये संगठन केवल कार्य ही नहीं कर रहे है अपितु अपने-अपने क्षेत्र में नम्बर एक स्थान पर भी है। आज यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा की संघ कार्य आक्टोपस जैसा हो गया है। संघ के बारे में एक उक्ति कही जाती है कि- 'संघ कुछ नहीं करेगा, केवल स्वयंसेवकों का निर्माण करेगा।Ó परंतु स्वयंसेवक कुछ नहीं छोड़ेगा वह समाज जीवन में जो-जो आवश्यक होगा वह सभी कार्य करेगा। इसलिए आज स्वयंसेवकों द्वारा चलाए जा रहे कार्यों पर दृष्टि पात करते हैं तो इनके कार्यों का देशभर में एक जाल सा बिछा दिखाई देता है और इन कार्यों से देशभर में समाज लाभान्वित भी होता दिखाई पढ़ रहा है।
वर्तमान में संघ द्वारा सम्पूर्ण भारत वर्ष लाखों सेवा कार्य संचालित है। देश में प्राकृतिक/देवीय आपदाओं- बाढ़, भूकम्प के समय सबसे पहले पहुंचकर सेवा कार्य करने वाले संघ के स्वयंसेवक होते हैं।
ग्राम विकास की दृष्टि से भी लाखों कार्य चल रहे हैं। भारत गांवों का देश है। इसलिए गांव समृद्ध तो देश समृद्ध होगा। इस दृष्टि से ग्रामवासियों के सहयोग से किसानों को उन्नत और जैविक खेती करना सीखाना, खेतीहर-मजदूरों को गांवों में काम उपलब्ध कराकर उन्हें पलायन से रोकना, गांवों में जल उपलब्धता की दृष्टि से हर खेत का पानी खेत में रहें इसके लिए श्रमदान से तालाब निर्माण करना। गांवों के बच्चों का अच्छी गुणवत्तायुक्त शिक्षा मिले इसके लिए ग्राम विद्यालय संचालित करना। सभी ग्रामवासियों का आपस में व्यवहार और रहन-सहन समरसता पूर्ण हो इसके लिए संस्कृत भाषा में संवाद करना सीखाना। गांव में स्वच्छता और पहुंच मार्ग श्रमदान से बनाना आदि कार्य स्वयंसेवकों की पहल पर ग्रामवासियों द्वारा हो रहे हैं।
संघ शुरू से चाहता है और करता आया है कि स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का विकास हो और इसके लिए अनेक प्रदेशों में स्वयंसेवकों द्वारा संवौधानिक रूप से शिक्षा समितियों का पंजीयन कराकर बड़े-बड़े शिक्षा संस्थान संचालित किए जा रहे हैं। राष्ट्रीयता के गुणों से ओत-प्रोत पीढ़ी का निर्माण करने की दृष्टि से देशभर में 32 हजार स्थानों पर सरस्वती शिशु मंदिरों का संचालन किया जा रहा है जिसके अन्तर्गत लगभग 35 लाख छात्र-छात्राएं अध्ययनरत है।
देशभर में चिकित्सा के व्यवसाय से जुड़े चिकित्सकों द्वारा गरीब लोगों के लिए सस्ती-शुलभ चिकित्सा उपलब्ध कराने की दृष्टि बड़े-बड़े चिकित्सालय संचालित हो रहे हैं। बड़े चिकित्सालयों में मरीज के साथ आने वालों की बहुत बड़ी संख्या होती है। उनके वहां रहने और भोजन की समस्या रहती है तथा अपनी बीमारी से संबंधित चिकित्सक से समय लेना और उन्हें मरीज को दिखाना यह चिकित्सा सेवा ग्रुप बनाकर इन अस्पतालों में मरीजों को चिकित्सा सलाह एवं सहयोग देना तथा उनके आवास व भोजन की व्यवस्था का करने कार्य बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।
देश में 15-20 प्रतिशत वनों में गिरीकंदराओं में लोग निवासरत् है। वे अपनी आजीविका चलाने के लिए अधिकांश वनोपज को एकत्र कर बेचना, कुछेक खरीब की फसल करने पर आश्रित होते हैं। उनके बच्चों की शिक्षा-दीक्षा उचित हो इसके लिए ञ्जह्म्द्बड्ढद्गह्य के क्षेत्र में एकल शिक्षक विद्यालय संचालित किए जा रहे है। दिल्ली में एक संस्था है 'संकल्पÓ यहां ढ्ढ्रस्, ढ्ढक्कस्, के क्षेत्र में ञ्जह्म्द्बड्ढद्गह्य के होनहार गरीब छात्रों का चयन कर उन्हें इन प्रतियोगी परीक्षा के लिए तैयारी कराते हैं। इस संस्था के गुणवत्तायुक्त संचालन में अनेक सेवानिवृत्त ढ्ढ्रस्, ढ्ढक्कस् अधिकारी जुड़े है जो अपनी सेवाएं नि:शुल्क दे रहे हैं।
दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो उपभोक्ता नहीं है। हर कोई किसी न किसी रूप में ग्राहक (उपभोक्ता) हैं और उपभोक्ता के अपने अधिकार होते हैं। उसका संरक्षण हो, उसका हित हो, उसे भी गुणवत्तापूर्ण वस्तुएं क्रय करने का अधिकार है आदि बातों को लेकर हमारे उपभोक्ताओं के साथ चूक हो जाती है तो उन्हें संरक्षण प्रदान करना, उनके लिए कानूनी सलाह देना आदि विषयों का ध्यान में रखते हुए स्वयंसेवकों ने ग्राहक पंचायत का गठन कर कार्य किया जा रहा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साधना है- भारत माता को जग सिरमौर बनाना। इस साधना की प्राप्ति में जो-जो कार्य आवश्यक है वे सब करना यह संघ की कार्य-योजना में है। लोक मन संस्कार करना, संघ की इस कार्य पद्धति में लोक संचय, लोक जागरण एवं लोक निर्माण की एक निश्चित एवं वैज्ञानिक पद्धति विकसित की गई है। संघ में प्रारम्भ से ही एक तंत्र और मंत्र को अपनाया है। अर्थात् तंत्र यानि दैनिक लगने वाली शाखा, जिसमें सायंकाल शिशु-बाल तथा प्रात: तरूण-नौजवान और रात्रि में किसान-मजदूर वर्ग के लोग किसी मैदान पर एकत्र होकर खेल-खेलना, भारत माता के गीत (कविता) गाना तथा समसामयिक समस्याओं के निदान हेतु चर्चा करना। इस प्रकार नित्य एक जगह एकत्र होना यानि देश-धर्म के लिए नित्य सिद्ध शक्ति का अर्जन करना यही संघ की शाखा है। मंत्र यानि भारत माता के प्रति भक्ति भाव से शाखा में नित्य कही जाने वाली प्रार्थना है, जिसमें भारत माता के प्रति यह संकल्प दोहराया जाता है कि मां तेरे कार्यों के लिए ही मैंने यह कमर कसी है। इसी एक घंटे की शाखा में से व्यक्ति ऐसा तप कर निकलता है और जीवनभर राष्ट्र के लिए जीता है। अर्थात् उसके हर कार्य में राष्ट्रीयता झलकती है। वर्तमान में देशभर में संघ की 50 हजार से अधिक शाखाएं है तथा संसार के अन्यान्य देशों में रह रहे अप्रवासी भारतीयों के बीच भी हिन्दू स्वयंसेवक संघ के नाम से कार्य चल रहा
समाज जीवन के अनेकों क्षेत्र है जहां अच्छी व्यवस्थाएं खड़ी करने की आवश्यकता है तभी समाज समरसता पूर्ण ढंग से परस्पर मिलजुल कर जीवन व्यापन कर सकता है। संघ इसी उद्देश्य को लेकर की सुसंपन्न, सुसमरस और सुसंस्कृत समाज का निर्माण हो और राष्ट्र समृद्धशाली, शक्तिशाली भारतीय राष्ट्र का निर्माण हो और पुन: गौरव के साथ अपनी भारतीय संस्कृति का परचम दुनिया में फहरा सकें, इसी उद्देश्य की प्राप्ति में डॉ. हेडगेवारजी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई है। (लेखक - शैक्षिक, विचारक, चिंतक एवं शिक्षाविद् है।)