बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा पर्व
   Date08-Oct-2019

य ह पर्व आश्विन शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। इस पर्व के लिए श्रवण नक्षत्र युक्त, प्रदोषव्यापिनी, नवमी विद्धादशमी प्रशस्त होती है। विजयादशमी का त्योहार वर्षा ऋतु की समाप्ति तथा शरद के आरंभ का सूचक है-
ईषमाससिता दशमी विजया शुभकर्मसुसिद्धिकरी कथिता।
श्रवणक्र्षयुता नितरां शुभगा नृपतेस्तु गमे जयसिद्धिकरी। (मुहूर्तचिन्तामणि)
क्षत्रियों का यह बहुत बड़ा पर्व है। इस दिन ब्राह्मण लोग सरस्वती पूजन एवं क्षत्रिय शस्त्र पूजन करते हैं- दुर्गा विसर्जन, अपराजिता, पूजन, विजय-प्रयाण, शमी पूजन तथा नवरात्रपारण इस पर्व के महान कर्म है। इस दिन संध्या के समय नीलकण्ठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है। इस दिन प्रात:काल देवी का विधिवत् पूजन करके नवमीविद्धा दशमी में विसर्जन तथा नवरात्र का पारण करना चाहिए। इस दिन विधिपूर्वक अपराजिता देवी के साथ जया तथा विजया देवियों के पूजन का भी विधान है और सायंकाल में दशमी पूजन तथा सीमोल्लंघन का विधान है। भारतवर्ष के कोने-कोने में इस पर्व से कुछ दिन पूर्व ही रामलीलाएं शुरू हो जाती हैं। सूर्यास्त होते ही रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। इस पर्व को भगवती (विजया) के नाम पर विजयादशमी कहते हैं। साथ ही इस दिन भगवान श्रीरामचंद्रजी ने रावण का वध किया था, इसलिए भी इस पर्व को विजयादशमी कहा जाता है। प्राचीनकाल में राजा लोग इसी दिन अपनी विजय यात्रा आरंभ करते थे। वैश्य अपने बही-खातों का पूजन भी इस दिन किया करते हैं। राजस्थान आदि कुछ प्रदेशों की परंपरा के अनुसार इस दिन घरों में भी गेरू से दशहरा मांडकर जल, रोली और चावल से पूजा की जाती है। पूजन में चावल, मूली तथा गुबारफली चढ़ाई जाती है और दीप, धूप से आरती होती है। दशहरा पर जो दो गोबर की हांडी रखी जाती है, उनमें से एक में रुपया तथा दूसरी में फल, रोली एवं चावल रखकर दोनों हांडियों को ढंक दिया जाता है। दीपक जलाकर परिक्रमा देकर दण्डवत किया जाता है। थोड़ी देर बाद हांडी में से रुपया निकालकर आलमारी में रख लिया जाता है, बही-बसने की भी पूजना करके रोली, चावल चढ़ाया जाता है। बहियों पर नवरात्र का नवयवाङ्कुर (ज्वारा) भी चढ़ाया जाता है।