पत्रकारिता 'पुरुषार्थ' की मिसाल 'मामाजी'...
   Date07-Oct-2019

शक्तिसिंह परमार
आज हमारे, आपके और हम सबके 'मामाजीÓ अर्थात् ब्रह्मलीन माणिकचंदजी वाजपेयी की जयंती है...'मामाजीÓ का संपूर्ण जीवन सादगी की मिसाल और प्रेरणाओं का पुंज है...जो सैकड़ों वर्षों तक न केवल पत्रकारिता जगत को, बल्कि संगठन की दृष्टि से स्वयंसेवकों को और सामाजिक दृष्टि से आमजन को प्रेरित करता रहेगा...'मामाजीÓ ने समाज, राष्ट्र जीवन के लिए ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता हेतु स्वयं को नि:स्वार्थ भाव से आहुत किया...क्योंकि वे सिर्फ एक राष्ट्रनिष्ठ पत्रकार और संपादक ही नहीं थे.., बल्कि 1944 से 1953 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे...यह उनकी समाज-राष्ट्र जीवन के लिए नि:स्वार्थ सेवा साधना थी...राजनीतिक फलक पर उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना के 1951 से लेकर 1954 तक उत्तरी मध्यभारत में संगठन मंत्री का कुशल दायित्व निर्वाह किया...एक कुशल शिक्षक के रूप में उन्होंने 1954 से 10 वर्षों तक शिक्षक और प्रधानाचार्य के रूप में शिक्षा दान का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया...एक विमर्शनिष्ठ और जाग्रत व प्रेरित करने वाले लेखक के रूप में उन्होंने 'आपातकालीन संघर्ष गाथाÓ, 'प्रथम अग्नि परीक्षाÓ, 'भारतीय नारी स्वामी विवेकानंद की दृष्टि मेंÓ, 'कश्मीर का कड़वा सचÓ, 'पोप का कसता शिकंजाÓ, 'ज्योति जला निज प्राण कीÓ और 'मध्यभारत की संघ गाथाÓ जैसी अमर कृतियों (पुस्तकों) का लेखन व प्रकाशन भी किया... पत्रकारिता में तो उनकी कर्मनिष्ठा का कोई तोड़ नहीं है..,तभी तो उन्होंने पहले भिंड से प्रकाशित साप्ताहिक 'देशमित्रÓ के संपादक के रूप में पत्रकारिता की यात्रा प्रारंभ की...दैनिक स्वदेश इंदौर से स्थापना काल (1966) से ही जुड़े...1968 से 1985 तक स्वदेश के संपादक एवं प्रधान संपादक रहे...इस दौरान उनका लेखन, संपादन व पत्रकारिता की दृष्टि से एक अभिभावक के रूप में समाचारों, संपादकीय, आलेख और समसामयिक घटनाओं-विषयों पर रिपोर्टिंग का पालन-पोषण करने, उन्हें समाज-राष्ट्र हित में कभी नुकीला, कभी चुटीला तो कभी गंभीर, विनोदपूर्ण के साथ ही आक्रामक बनाने में उन्हें महारत हासिल थी...उन्हें अगर हम समय-समय पर 'पत्रकारिता के विश्वविद्यालय मामाजीÓ का संबोधन देते रहे हैं तो उनके संपूर्ण पत्रकारिता जीवन का सबसे सटीक विश्लेषण है...क्योंकि वे समाचार-पत्र की दृष्टि से न केवल समाचारों को संपादन व शीर्षक के जरिए जीवंत करते थे..,बल्कि उस समाचार के स्थान निर्धारण में भी समाज-राष्ट्र का जागरण व हित ध्यान रखते थे...समाचार-पत्र के अन्य विभागों जैसे प्रूफ रीडिंग, प्रसार-विज्ञापन से लेकर छपाई व गंतव्य तक की उन्हें न केवल चिंता रहती थी..,बल्कि जरूरत पडऩे पर वे इन सभी विभागों में उत्तरदायित्व निर्वाह के लिए तैयार भी रहते थे...और अनेकों बार इसका पूरी सिद्दत से निर्वाह भी किया...जो उनके साथ काम करने वालों के लिए प्रत्येक दृष्टि से प्रेरणादायी बन जाता था...समाजहित में समाचार-पत्र को क्या प्रकाशित करना चाहिए और किससे समाज को बचाना चाहिए, इसकी भी उनके पत्रकारिता, कार्यव्यवहार में स्पष्ट झलक दिखती थी...7 अक्टूबर 1919 को बटेश्वर जिला आगरा (उ.प्र.) में जन्मे 'मामाजीÓ का पूरा जीवन राष्ट्रसेवा को समर्पित रहा...उन्होंने अपनी कलम से न केवल पूरे मध्यप्रदेश में धाक जमाई.., बल्कि राष्ट्रनिष्ठ विचारों के प्रचार-प्रसार में अग्रदूत की भूमिका निभाई...स्वदेश में उनकी 'समय की शिला परÓ, 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने संविधान के आईने मेंÓ और 'केरल में माक्र्स नहीं, महेशÓ जैसी बहुचर्चित और आंदोलित कर देने वाली लेखमालाएं उनके पत्रकारिता पुरुषार्थ का प्रमाण है...संयोग से 'मामाजीÓ का वर्ष 2019-20 जन्मशताब्दी वर्ष है...आइये इस पुण्य स्मरण पर्व पर हम 'मामाजीÓ के विचारों-कार्यों-संकल्पों और ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के उस पुरुषार्थ को पुन: नया आयाम देने का संकल्प लें.., ताकि ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता का विचार अजर-अमर हो सके...यही 'मामाजीÓ को उनके आविर्भाव पर सच्चा स्मरण होगा...इसी विश्वास-भाव के साथ 'मामाजीÓ के चरणों में स्वदेश परिवार का कोटि-कोटि नमन...