शरद पवार दोषी नहीं तो जांच का डर क्यों?
   Date07-Oct-2019

अवधेश कुमार
म हाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक घोटाला में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा राकांपा के अध्यक्ष शरद पवार तथा उनके भतीजे अजीत पवार सहित बैंक के 70 पूर्व पदाधिकारियों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग और अन्य मामलों में मुकदमा दर्ज किए जाने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में तो हंगामा मचा ही है, देश में भी इसे बड़ा मुद्दा बनाया गया है। शरद पवार का नाम नहीं आता तो यह देशव्यापी चर्चा का विषय नहीं होता। अजीत पवार का नाम इस घोटाले में पहले से चल रहा था। इसलिए उनके नाम पर पार्टी अवश्य विरोध करती लेकिन यह इतना बड़ा राजनीतिक बड़ा मामला नहीं बनता। किसी बड़े नेता पर जब भी भ्रष्टाचार के खिलाफ मुकदमा दर्ज होता है उसे हमेशा राजनीतिक रंग दिया जाता है। इस समय महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव है इसलिए यह आरोप लगाना ज्यादा आसान है कि पूरा मामला ही राजनीति से प्रेरित है। शरद पवार ने राजनीतिक तरीके से इसका जवाब देने की रणनीति भी अपनाई है। वे कह रहे हैं कि हम शिवाजी के अनुयायी हैं और दिल्ली के तख्त के आगे नहीं झुकेंगे। यह साफ तौर पर राजनीति का मराठा कार्ड खेलना है। इसमें मराठा स्वाभिमान का स्वर स्पष्ट तौर पर सुनाई दे रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जो दिल्ली की हुकूमत है, उसके अधिकार का इस्तेमाल करने की बात किसी के मन में हो तो उन्हें इसकी चिंता नहीं है।
इसमें विचित्र बात यह है कि प्रवर्तन निदेशालय ने अभी उनको नोटिस जारी नहीं किया है लेकिन उन्होंने स्वयं उसके दफ्तर जाने की घोषण की और उसके कारण मुंबई में जो स्थिति पैदा हुई वह हमारे सामने है। वास्तव में शरद पवार ने इस मामले को अपने पक्ष में राजनीतिक सहानुभूति पाने का हथियार बनाने की रणनीति अपनाई है। उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर भी उन्होंने निशाना साधा। हालांकि फडणवीस ने इस आरोप को खारिज किया कि पवार के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का मामला राजनीति से प्रेरित है और यह अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर दर्ज किया गया। फडणवीस ने पवार के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति जो राजनीति को समझता है, वह जानता है कि राज्य इस तरह का (बदले की राजनीति जैसा) कोई कदम नहीं उठा सकता, क्योंकि ईडी राज्य सरकार के अधिकारक्षेत्र में नहीं आता। जो दोषी हैं, उन्हें सजा मिलेगी। जो दोषी नहीं हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई का सवाल ही नहीं उठता।Ó पवार ने इससे पहले कहा था कि उनकी रैलियों में जबरदस्त भीड़ देखकर राजनीतिक से प्रेरित होकर मुकदमा दर्ज करवाया गया है। शरद पवार ने यह कहकर कि जेल जाने में उन्हें कोई समस्या नहीं है अपने कार्यकर्ताओं को भावनात्मक रूप से उद्वेलित करने की रणनीति अपनाई और इसका असर हुआ। पवार ने कहा कि मुझे कोई समस्या नहीं होगी अगर मुझे जेल जाना पड़ता है। इससे मुझे खुशी होगी, क्योंकि मेरा पहले कभी जेल जाने का अनुभव नहीं रहा है। अगर कोई मुझे जेल भिजवाने की तैयारी कर रहा है तो मैं इसका स्वागत करता हूं। इस बयान के बाद पार्टी ने ईडी कार्यालय के सामने उग्र प्रदर्शन किया। तो यह स्थिति आगे भी जारी रहेगी। प्रश्न है कि क्या इसे खालिस राजनीति का मामला मान लिया जाए या इसमें तार्किकता भी है?
सबसे पहले यहां यह जानना जरुरी है कि बॉम्बे उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक घोटाला मामले में न्यायालय में पेश किए गए तथ्यों के आधार पर शरद पवार और अन्य आरोपियों पर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया था। न्यायमूर्ति एससी धर्माधिकारी और एसके शिंदे ने कहा था कि आरोपितों के खिलाफ 'विश्वसनीय साक्ष्यÓ हैं। यह करीब 25 हजार करोड़ का घोटाला है। क्या बिना किसी की संलिप्तता के ही इतनी राशि हवा हो गई? इस मामले में मुंबई पुलिस ने पिछले महीने ही एक प्राथमिकी दर्ज की थी। ईडी ने कहा है कि मनी लांड्रिंग निरोधक अधिनियम (पीएमएलए) के तहत पुलिस की ओर से दर्ज एफआइआर के समकक्ष मानी जाने वाली एन्फोर्समेंट केस इंफॉर्मेशन रिपोट या प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) दर्ज की है जो मुंबई पुलिस की प्राथमकी के आधार पर दर्ज किया गया है। इसमें बैंक के पूर्व अध्यक्ष, महाराष्ट्र के पूर्व उप मुख्यमंत्री अजीत पवार और सहकारी बैंक के 70 पूर्व पदाधिकारियों के नाम हैं। पुलिस की प्राथमिकी के आधार पर ही ईडी की प्राथमिकी में शरद पवार का नाम दर्ज किया गया है। राज्य की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की शिकायत के आधार पर इस साल अगस्त में मुंबई पुलिस ने केस दर्ज किया था। इसी आधार पर ईडी ने मनी लांड्रिंग के आरोप लगाए हैं। एजेंसी ने कर्ज देने और अन्य प्रक्रिया में कथित अनियमितता की जांच के लिए मामला दर्ज किया है। इस प्राथमिकी में महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों के बैंक अधिकारियों को भी आरोपी बनाया गया है। आरोप है कि यह सारा फर्जीवाड़ा संचालक मंडल द्वारा लिए गए गलत फैसलों की वजह से संभव हो पाया। ईडी उन आरोपों की जांच कर रही है कि एमएससीबी के शीर्ष अधिकारी, अध्यक्ष, एमडी, निदेशक, सीईओ और प्रबंधकीय कर्मचारी तथा सहकारी चीनी फैक्टरी के पदाधिकारियों को अनुचित तरीके से कर्ज दिए गए। राज्य सहकारी बैंक से शक्कर कारखानों और कपड़ा मिलों को बेहिसाब कर्ज बांटे गए। इसके अलावा कर्ज वसूली के लिए जिन कर्जदारों की संपत्ति बेची गई, उसमें भी जान- बूझकर बैंक को नुकसान पहुंचाया गया। पुलिस की प्राथमिकी के मुताबिक, एक जनवरी 2007 से 31 मार्च 2017 के बीच हुए महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक घोटाले के कारण सरकारी खजाने को करीब 25 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यहां यह भी याद दिलाना जरूरी है कि महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक में अनियमितताओं के लिए शरद पवार के अलावा 75 राजनेताओं के खिलाफ नैशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर ऐंड रूरल डिवेलपमेंट यानी नाबार्ड ने जांच की थी। नाबार्ड ने 2010 में अपनी जांच रिपोर्ट में इनको दोषी माना था। यह बात अलग है कि प्रदेश एवं केन्द्र दोनों जगह सरकार होने के कारण यह मामला जहां के तहां रुक गया।
ईडी की प्राथमिकी उस रिपोर्ट का भी उल्लेख है। यही नहीं उसने महाराष्ट्र कोऑपरेटिव सोसायटीज कानून के तहत दाखिल आरोपपत्र और इंटरनल ऑडिटर मेसर्स जोशी ऐंड नाइक एसोसिएट्स की रिपोर्ट को भी आधार बनाया है। इन सबमें घोटाले की पूरी कहानी है। साफ है ईडी इस मामले में पवार और एमएससी बैंक में 2001 से 2017 के बीच रहे डायरेक्टरों और पदाधिकारियों सहित उन लोगों से पूछताछ कर सकता है, जिनके नाम एन्फोर्समेंट केस इंफर्मेशन रिपोर्ट में दर्ज हैं।
यह सच है कि शरद पवार का जिक्र किसी भी रिपोर्ट में नहीं है लेकिन शिकायतकर्ता सुरिंदर अरोड़ा ने मुंबई पुलिस के सामने पेश अपने हालिया पूरक बयान में दावा किया था कि घोटाला शरद पवार के संरक्षण के बिना नहीं हो सकता था। बयान उस प्राथमिकी का हिस्सा है, जिसके आधार पर ईडी कार्रवाई कर रहा है। ऐसे में शरद पवार की भूमिका की भी जांच की जाएगी। अजित पर आरोप हैं कि एमएससी बैंक ने जो कर्ज आवंटित किए थे उनके लिए जमानत नहीं ली गई थी और कर्ज सब्सिडी वाली सस्ती दर पर दिया गया था। मुंबई पुलिस में दर्ज प्राथमिकी के मुताबिक कर्ज की पुनर्रचना इसलिए की गई थी कि उसमें कुछ निदेशकों का निजी हित था। कर्ज समिति ने नाबार्ड के क्रेडिट मॉनिटरिंग अरेंजमेंट का उल्लंघन करते हुए बड़े राजनेताओं की उन कोऑपरेटिव चीनी मिलों को 2007-08, 2008-09 और 2010-11 में कम मार्जिन पर लोन आवंटित किया था जिनकी नेट वर्थ नकारात्मक थी और जो घाटे में चल रही थीं। इससे बैंक को 297.14 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। पवार पर कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरियों को बेचने के मामले में अनियमितता के आरोप लगे हैं। आरोपों के मुताबिक कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरियों को कथित रूप से करीबी लोगों को रिजर्व प्राइस से कम दाम पर बेचा गया था। मुकदमे में फाइल आरोप पत्र के मुताबिक, बैंक ने छह शुगर फैक्टरियों के मामले में सिक्यॉर्ड असेट्स को ऑफसेट प्राइस से बेचकर घोर अनियमितता की है। इन सौदों में 86.56 करोड़ रुपये का लॉस हुआ था।
शरद पवार और उनके समर्थकों का यह तर्क अपनी जगह है कि वे न तो कोऑपरेटिव बैंक के संस्थापक थे और न कोई पदधारी, किंतु इतने से किसी को पाक साफ होना साबित नहीं होता। राजनीतिक प्रभाव के कारण सबको मालूम था कि पवार परिवार की एमएससीबी में कितनी चलती थी। ईडी के पास ज्यादातर ऐसे ही मामले आते हैं जिनमें आरोपी का सीधा कोई संबंध नहीं दिखता।
मनी लौंड्रिग के मामले में तार से तार जोडऩे होते हैं। इस तरह पवार एवं उनके समर्थक जो भी तर्क दें, ईडी का मानना है कि पुलिस की प्राथमिकी, उच्च न्यायालय के आदेश, नाबार्ड की रिपोर्ट तथा इंटरनल ऑडिटर मेसर्स जोशी ऐंड नाइक एसोसिएट्स की रिपोर्ट में उन पर संदेह करने के पर्याप्त आधार हैं। जांच में यदि वे निर्दोष साबित होते हैं तो कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। यदि उन्हें लगता है कि उनके खिलाफ मामला राजनीति से प्रेरित है तो उन्हें सीधे उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का रुख करना चाहिए।