दूसरों को कष्ट देना ही सबसे बड़ा अधर्म
   Date07-Oct-2019

धर्मधारा
स्वा र्थ और अहंकार से मुक्त होकर औरों के लिए जो कष्ट उठाया जाता है, वही सच्चा धर्म है। धर्म है औरों के लिए, राष्ट्र के लिए, विश्व के लिए स्वयं का उत्सर्ग। परहित अर्थात् औरों की खुशी के लिए, औरों की पीड़ा मिटाने के लिए स्वयं को उत्सर्ग कर देना ही धर्म है। यह प्रक्रिया अत्यंत कष्टदायी अवश्य है, परंतु इसी में सुख, शांति एवं संतोष मिलता है। ऐसे में, धर्म कष्टों अथवा संकटों से घिरा अवश्य होता है, धर्म के पालन से कठिनाई अवश्य होती है, परंतु अंतत: धर्म की ही जीत होती है और धर्मपालन का परिणाम अत्यंत श्रेष्ठ एवं संतोषदायक होता है औरों को क्लेश देना अधर्म है और परहित हेतु क्लेश सहना धर्म है। समर्थ और शक्तिशाली व्यक्ति दूसरों को कष्ट दे सकता है और कष्ट देने में उसे कोई अतिरिक्त चेष्टा भी नहीं करनी पड़ती। सबल निर्बल को सता सकता है और सताता भी है। अपनी सामथ्र्य और संपदा का उपयोग और उपभोग तो सभी करते हैं। अपने सुख को प्राथमिकता देना सामान्य बात हो सकती है। स्वयं के लिए तो सभी जीते हैं, परंतु ये सभी मानदंड और मापदंड, ईश्वर के श्रेष्ठ राजकुमार इनसान के लिए सही ठहराए नहीं जा सकते हैं। ऐसी प्रकृति और प्रवृत्ति तो मानवेतर प्राणियों में भी पाई जाती है, फिर मानव और मानवेतर प्राणियों में अंतर क्या है, फरक क्या है? यह अंतर धर्म ही है, जो मनुष्य को अन्य योनियों से अलग खड़ा करता है, विशिष्ट और विशेष बनाता है और इसे प्रकृति का सर्वोत्तम एवं श्रेष्ठ प्राणी बनाने में विशिष्ट भूमिका अदा करता है।