अयोध्या मामले की सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित
   Date17-Oct-2019

नई दिल्ली   16 अक्टूबर (वा)
प्राचीन इतिहास के पन्नों को पलटते हुए, धार्मिक मान्यताओं एवं परम्पराओं तथा पुरातात्विक सवालों पर विचारोत्तोजक बहस के बीच अयोध्या की विवादित जमीन से संबंधित मुकदमे पर 40 दिन तक जिरह होने के बाद इस ऐतिहासिक सुनवाई का बुधवार को पटाक्षेप हो गया। अब पूरे देश की निगाह मामले के फैसले पर टिकी है। देशवासियों को इंतजार है तो बस अयोध्या मामले पर फैसले का।
श्रीराम जन्मभूमि पर अपने दावे के पक्ष में जहां रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा, ऑल इंडिया हिन्दू महासभा, जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति एवं गोपाल सिंह विशारद ने दलीलें दी, वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड, हासिम अंसारी (मृत), मोहम्मद सिद्दिकी, मौलाना मेहफुजुरहमान, फारुख अहमद (मृत) और मिसबाहुद्दीन ने विवादित स्थल पर बाबरी ढांचा के मालिकाना हक का दावा किया। इस मामले में शीर्ष अदालत की ओर से न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) मोहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला के नेतृत्व में गठित तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल की ओर से मध्यस्थता असफल रहने की बात बताए
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ठ्ठजस्टिस रंजन गोगोई ने समयसीमा निर्धारित की-गोगोई ने मामले की शुरुआत में ही रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़े और सुन्नी वक्फ बोर्ड का अलग-अलग समय निर्धारित किया, ताकि वे समय के भीतर अपनी दलीलें रख सकें। गोगोई ने स्पष्ट किया कि सभी पक्ष 2.77 एकड़ में फैले विवादित स्थल के मालिकाना हक पर केंद्रित अपने तर्क-दलीलें रखें। उन्होंने सुनवाई के दौरान बढ़ते आक्रोश को देखते हुए कई बार हस्तक्षेप किया।
ठ्ठजस्टिस एसए बोबड़े ने धार्मिक मान्यता पर सवाल पूछे-जस्टिस बोबड़े ने मामले में सभी पक्षों के धार्मिक विश्वास और मान्यता से जुड़े सवाल पूछे। उन्होंने मुस्लिम पक्ष से उनके सबसे पवित्र स्थल की अहमियत के बारे में पूछा। साथ ही हिंदू पक्ष से भगवान के जन्म स्थान से जुड़ी दैवीय महत्ता पर सवाल दागे। एएसआई रिपोर्ट को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्षों की दलीलों पर उन्होंने सवाल किए। बोबड़े ने कहा था कि हम एएसआई रिपोर्ट के संदर्भों की वैधता को परखेंगे, क्योंकि मामले में कोई भी प्रत्यक्षदर्शी नहीं है।
ठ्ठ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने आस्था को कानूनी कसौटी पर परखा-जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कानूनी नजरिये से आस्था के पहलू को परखा और सभी पक्षों की धार्मिक मान्यताओं पर आधारित तर्कों को मौजूदा कानून व्यवस्था की कसौटी पर जांचकर सवाल किए। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट की छह हजार पेज के निर्णय के संदर्भों का भी उल्लेख करते हुए दोनों पक्षों की बहस और तर्कों की वैधता को परखा। उन्होंने साफ कहा कि विशेषज्ञों द्वारा तैयार एएसआई रिपोर्ट को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
ठ्ठ जस्टिस अशोक भूषण का हाईकोर्ट के निर्णय पर ध्यान-जस्टिस अशोक भूषण ने हाईकोर्ट के निर्णय के आधार पर सभी पक्षों से सवाल किया। उन्होंने गवाहों से जिरह कर मामले से जुड़ी अहम सूचनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने मामले से जुड़े चित्रों खासकर 1950 के ढांचे की तस्वीरों की जांच की और घटनाक्रमों को जोडऩे की कोशिश की।
ठ्ठ जस्टिस नजीर ने एएसआई रिपोर्ट की वैधता मानी-जस्टिस एसए नजीर ने सभी पक्षों के वकीलों को धैर्य से सुना। उन्होंने एएसआई रिपोर्ट की वैधता पर सवाल उठाने पर मुस्लिम पक्षों को फटकारा भी। उन्होंने कहा कि एएसआई की रिपोर्ट किसी अन्य राय जैसा नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों के निर्देश पर ही विवादित स्थल पर उत्खनन किया गया। जस्टिस नजीर ने पूछा था, अगर पुरातत्व विज्ञान नहीं है तो साक्ष्य कानून की धारा 45 को कैसे अमल में लाया जाएगा।