प्राण ऊर्जा का असंतुलन ही रोग का कारक
   Date10-Oct-2019

धर्मधारा
प्रा ण और पर्याप्तियों पर ही हमारा स्वास्थ्य निर्भर करता है। शरीर एवं प्राण का अपव्यय अथवा दुरुपयोग ही रोक सकता है और न अपने आपको नीरोग ही रख सकता है। आत्मिक आनन्द सच्ची शांति तो प्राण ऊर्जा के सदुपयोग से ही प्राप्त होती है यही प्रत्येक मानव के जीवन का सही लक्ष्य होता है। प्रतिक्षण हमारे प्राणों का क्षय हो रहा है। अत: हमारी सारी प्रवृत्तियाँ यथा संभव सम्यक होनी चाहिये। पाँचों इन्द्रियाँ, मन, वचन, काया का संयम स्वास्थ्य में सहायक होती है तथा उनका असंयम रोगों को आमन्त्रित करता है। हवा, भोजन और पानी से ऊर्जा मिलती है, परन्तु उनका उपयोग कब, कैसे, कितना, कहाँ का सम्यक् ज्ञान और उसके अनुरूप आचरण आवश्यक होता है? स्वाध्याय? ध्यान, कायोत्सर्ग भी उत्सर्ग के स्त्रोत होते हैं, जिसका जीवन में आचरण आवश्यक होता है। प्राण ऊर्जा के सदुपयोग में शरीर स्वस्थ, मन संयमित, आत्मा जागृत और प्रज्ञा विकसित होती है।
शरीर से ही आत्मा और मन के भावों की अभिव्यक्ति होती है, मन शरीर के सभी विषयों को अभिव्यक्त करने की क्षमता रखता है। मन और वचन का अलग से कोई अस्तित्व नहीं होता। सभी बनते है चित के द्वारा जो मन के लिए सामग्री चाहिए उसका आकर्षण काया के द्वारा ही होता है। मनन से पहले और मनन के बाद में भी मन नहीं होता। उसी प्रकार बोलने के पहले और बोलने के पश्चात् वाणी नहीं होती। भाषा और मन का अस्तित्व शरीर पर निर्भर होता है। जीव शरीर को उत्पन्न करता है। शरीर वीर्य को उत्पन्न करता है और वीर्य, मन, वचन, और काया की हलन-चलन को उत्पन्न करता है। सारी शक्ति का केंद्र, सारी शक्ति का संचालन, नियंत्रण और आत्मा की समस्त अभिव्यक्तियाँ शरीर के द्वारा ही होती है। शरीर हमारी सारी शक्ति का उत्पादक यंत्र है। जहां से ये शक्तियाँ विभिन्न मार्गो में प्रवाहित होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार आत्मा से शरीर और मन, मस्तिष्क प्रभावित होते हैं, उसी प्रकार शरीर की गतिविधियों से मन और आत्मा भी प्रभावित होते है। जिस स्तर का रोग हो उसके अनुरूप उपचार करने से ही स्थायी एवं प्रभावशाली परिणाम शीघ्र प्राप्त होते है।