धर्मधारा

ईश्वरत्व की प्राप्ति के साधन कर्तव्य और सदाचार

कैसे करूं ईश-आराधन? कैसे करूं प्रभु की सेवा? कैसे करूं प्रभु की पूजा? कैसे मनाऊं अपने प्रभु को? कैसे रिझाऊं अपने आराध्य को? कैसे और कब होंगे भगवान मुझ पर प्रसन्न? आदि प्रश्न अक्सर अध्यात्म पथ के पथिकों के मन में आते ही रहते हैं। ऐसा होना स्वाभाविक है, क्योंकि हर कोई जीवन में आनंद चाहता है, प्रेम चाहता है, कृपा चाहता है। इसलिए हर कोई विधि-विधानपूर्वक ईश्वर की उपासना करता है, उनका अभिनंदन करता है, पूजन करता है, अर्चन करता है, वंदन करता है और व्रत और उपवास करता है।इतना करने के बाद भी अभीष्ट फल की प्र..

महान धर्मरक्षक गुरु अर्जुन देवजी

3 नवम्बर 1605 को मुगल बादशाह जहाँगीर आगरा की गद्दी पर बैठा। गद्दी पर बैठते ही उसने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का काम प्रारम्भ कर दिया। उधर भारत के संत-महात्मा, धर्माचार्य जनता को दृढ़ता से अपने धर्म पर अडिग रहने का उपदेश दे रहे थे। पंजाब में उस समय पाँचवे पातशाह गुरु अर्जुन देवजी का बड़ा प्रभाव था। बड़ी संख्या में लोग उनके प्रवचन सुनने आते थे और हिन्दू धर्म में दृढ़ निष्ठा का संकल्प लेते थे।इन्हीं दिनों जहाँगीर का बड़ा बेटा खुसरो अपने बाप से बगावत कर गुरुजी की शरण में चला गया। इससे जहाँगीर आग बबूला ..

मनोबल ऊंचा हो तो कठिन से कठिन कार्य भी हो जाता है संभव

 एक बार की बात है गौतम बुद्ध अपने भिक्षुओं के साथ विहार करते हुए शाल्यवन में एक वटवृक्ष के नीचे बैठ गए। धर्म चर्चा शुरू हुई और उसी क्रम में एक भिक्षु ने उनसे प्रश्न किया "भगवन्! कई लोग दुर्बल और साधनहीन होते हुए भी कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी मात देते हुए बड़े-बड़े कार्य कर जाते हैं, जबकि अच्छी स्थिति वाले साधन सम्पन्न लोग भी उन कार्यों को करने में असफल रहते हैं। इसकाक्या कारण हैं? क्या पूर्वजन्मों के कर्म अवरोध बनकर खड़े हो जाते हैं?"‘नहीं’ बुद्ध उन्हें समझाने के लिए एक प्रेरक ..